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पिंजरा सोने का था, पर पंछी प्यासा था: राजा आहिल और रानी नैना की कथा– नरसा राम जांगु डीडवाना_कुचामन

 

जो नदी को बाँधने निकले थे, वे खुद ही डूब गए — और जो उसे रास्ता दे गए, वे समंदर कहलाए। राजा आहिल के महल की दीवारें आसमान छूती थीं, पर उसकी रातें डर से छोटी पड़ जाती थीं। उसे लगता था कि ताले, तलवारें और पहरे उसकी सल्तनत को अमर कर देंगे। फिर एक दिन नदी किनारे उसे नैना मिली — जिसके पास कुछ नहीं था, सिवाय बहते रहने की ज़िद के। उसी ने आहिल को बताया कि राजा मुकुट से नहीं, भरोसे से बनता है।

धरती पर शायद ही कोई राज्य आहिल के जैसा वैभवशाली रहा हो। खज़ानों में सूरज कैद था, अस्तबल में हवा से तेज घोड़े हिनहिनाते थे, और उसके एक इशारे पर हज़ारों सिर झुक जाते थे। पर आहिल सो नहीं पाता था। आँख बंद करते ही उसे लगता — कोई आ रहा है, कोई उसका तख्त छीन रहा है, कोई उससे बेहतर राजा बन रहा है। इसी खौफ ने उसके महल को क़ब्र बना दिया। दीवारें इतनी ऊँची कि दुआएँ भी लौट आतीं, पहरे इतने सख्त कि खुद उसकी परछाईं भी डरकर चलती। लोग फुसफुसाते, “हमारा राजा ज़िंदा है, पर ज़िंदगी से दूर है।” फिर एक दोपहर शिकार के बहाने वह जंगल चला आया। वहाँ, जहाँ पेड़ भी झुककर नदी का पानी पीते थे, उसने नैना को देखा। वह नदी से उलझ रही थी, हँस रही थी, उसके गीले पैरों में चाँदी की पायल-सी लहरें लिपटी थीं। न रेशम था, न मोती — बस एक मैली-सी ओढ़नी, मिट्टी की गगरी और आँखों में ठहरा हुआ पूरा ब्रह्मांड। आहिल ने पूछा, “जंगल, अँधेरा, अकेली लड़की… डर नहीं लगता?” नैना ने पानी उछालकर कहा, “राजन, डरूं तो जीना छोड़ दूँ? नदी को रोकोगे तो वह घर उजाड़ देगी। उसे गले लगाओगे तो वह खेत सींच देगी। बहाव को रास्ता चाहिए, बंधन नहीं।” उस दिन पहली बार आहिल के कलेजे की सख्त ज़मीन पर किसी ने फूल रख दिया।

नैना जब रानी बनकर आई तो लगा महल साँस लेगा। उसने पहले ही दिन दरवाज़े खोल दिए। अन्न के गोदामों पर से ताले हटे, तो चूल्हों में आग जली। वैद्य बुलाए गए, तो महल की दहलीज़ पर से कराहें विदा हुईं। जहाँ कभी हाथी झूमते थे, वहाँ अब बच्चों के ककहरे गूँजने लगे। मंत्री भागे-भागे आए, “महारानी, ऐसे तो खज़ाना रीत जाएगा!” नैना ने तुलसी के पौधे में पानी देते हुए कहा, “मंत्री जी, नदी समुद्र में मिलकर खाली नहीं होती, बड़ी हो जाती है। धन बाँटने से घटता नहीं, दुआओं से भर जाता है।” आहिल खिड़की से देखता रहा। हर दिन उसके डर की एक दीवार किरच-किरच होकर गिरती रही।

एक साल बाद जब दुश्मन की नगाड़ियाँ सीमा पर गूँज उठीं, तो सबको यकीन था — राजा अब तहखाने में छिपेगा। पर महल के बाहर जो मंजर था, उसने दुश्मन के घोड़ों के पाँव बाँध दिए। वहाँ कोई सेना नहीं थी। वहाँ वो किसान खड़े थे जिनके खेतों में नैना ने कुएँ खुदवाए थे। वो औरतें थीं जिनके बच्चों को पाठशाला मिली थी। वो बूढ़े थे जिन्हें दवा मिली थी। सबके हाथों में लाठी थी, पर आँखों में तलवार से ज़्यादा धार थी। नैना ने आहिल की हथेली थामी और बस इतना कहा, “राजा वो नहीं जिसके लिए लोग मरने से डरें। राजा वो है जिसके लिए लोग जीना चाहें।” आहिल की आँखें भीग गईं। उसने पहली बार तलवार म्यान में रखी और सिर झुकाकर अपनी प्रजा को प्रणाम किया। युद्ध शुरू होने से पहले ही जीत हो चुकी थी।

उस दिन के बाद इतिहास ने दो नाम दर्ज किए — ‘प्रजा का राजा आहिल’ और ‘राजा का कलेजा नैना’। क्योंकि सच यही है: पिंजरे चाहे सोने के हों, पंछी को आसमान ही भाता है। जो बाँधता है वह टूटता है, जो बहाता है वह अमृत हो जाता है। डर की दीवार गिरा दो, तो हर आँगन अपना लगता है।

नरसा राम जांगु
डीडवाना_कुचामन

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