खामोशी की गूंज – डॉ इंदु भार्गव जयपुर

बरसों बाद आज फिर उस पुराने घर का दरवाज़ा खुला था। आँगन वैसा ही था, तुलसी का चौरा भी वहीं था, लेकिन घर में अब कोई आवाज़ नहीं थी। कभी इसी घर में हँसी की खनक गूंजती थी, माँ की पुकार सुनाई देती थी, और पिता की धीमी-सी खाँसी भी घर को जीवंत बना देती थी।
राघव धीरे-धीरे घर के कमरों में घूम रहा था। दीवारों पर टंगी पुरानी तस्वीरें जैसे उससे बातें करना चाहती थीं। उसने माँ की तस्वीर पर जमी धूल साफ की और एक लंबी साँस ली। उसकी आँखों में नमी उतर आई।
माँ को गुज़रे पाँच साल हो चुके थे। नौकरी और शहर की भागदौड़ में वह इतना उलझ गया था कि उनके अंतिम दिनों में भी उनके पास ज़्यादा समय नहीं बिता पाया। तब उसे लगता था कि समय बहुत है। लेकिन समय कब हाथों से फिसल गया, उसे पता ही नहीं चला।
उसने माँ की अलमारी खोली। अंदर सलीके से रखे कपड़ों के बीच एक पुरानी डायरी मिली। काँपते हाथों से उसने उसे खोला। पहले पन्ने पर माँ की लिखावट थी—
राघव बहुत व्यस्त रहता है। जब भी फोन करता है, कहता है— माँ, अभी काम है, बाद में बात करता हूँ। मैं समझती हूँ, उसे आगे बढ़ना है। बस कभी-कभी उसकी आवाज़ सुनने का मन करता है।
राघव की आँखों से आँसू टपक पड़े। वह आगे पढ़ता गया।
आज उसकी पसंद की खीर बनाई थी। सोचा था आएगा तो खिलाऊँगी। शायद अगले महीने आए…
लेकिन वह अगला महीना कभी नहीं आया था।
पूरा घर शांत था। कोई शब्द नहीं, कोई शिकायत नहीं। फिर भी राघव को लग रहा था कि हर दीवार उससे कुछ कह रही है। माँ की चुप्पी, उनके अधूरे इंतज़ार, उनके अनकहे प्रेम की गूंज उस खामोशी में साफ सुनाई दे रही थी।
वह आँगन में जाकर बैठ गया। शाम ढल रही थी। हवा में तुलसी की हल्की सुगंध घुली हुई थी। उसे अचानक महसूस हुआ कि शब्दों से कहीं अधिक गहरी होती है खामोशी। शब्द अक्सर सुनाई देते हैं, लेकिन खामोशी दिल के भीतर उतर जाती है।
राघव ने आसमान की ओर देखा और धीमे से कहा, “माँ, मुझे माफ़ कर दो।”
कोई उत्तर नहीं मिला। फिर भी उसे लगा जैसे माँ ने उसके सिर पर हाथ फेर दिया हो। उसकी आत्मा में एक अजीब-सी शांति उतर आई।
उस दिन राघव ने जाना कि प्रेम हमेशा शब्दों में व्यक्त नहीं होता। कभी-कभी वह खामोशी बनकर हमारे आसपास रहता है, और जब अपने लोग दूर चले जाते हैं, तब वही खामोशी जीवन भर गूंजती रहती है।
खामोशी की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह बोलती नहीं, फिर भी बहुत कुछ कह जाती है। उसकी गूंज कानों में नहीं, सीधे हृदय में सुनाई देती है!!
डॉ इंदु भार्गव जयपुर




