Uncategorized

राजनीति की बिसात — विनोद कुमार शर्मा

राजनीति सतत सत्ता पाने की नीति सत्ता पाने संघर्ष मिली तो बचाने संघर्ष इसमें जो पीछे रह गए हांसिए पर अर्थात गुमनामी में गए साम दाम दण्ड भेद तो इसके टूल जरूरत तो करते उपयोग भोग सत्ता मिली राजा न मिली तो रंक अंगूर खट्टे कमजोर पड़े तो नैतिकता की दुहाई चिल्लाना शोर मचाना पुरातन से यही हो रहा बीर भोग्या वसुंधरा चरितार्थ आलसी डरपोक बहानों में जकड़ा पड़ा राजनीति के महाकुंभ इलेक्शन में स्नान मतदाता का रुझान एक को चुन गद्दी देता अन्यों को पुनः प्रयास के जंगल बियाबान।
भारतीय लोकतंत्र पुराना लचीला और विकसित तंत्र जीतने वाले को सब कुछ अनुकूल हारने बालों को EVM की गड़बड़ी के गुणगान।
दल बदल कानून बनते जनमानस खुश हमारे दिए वोट का होगा अवश्य सम्मान नैतिकता पर खरा खरीद फरोख्त से  दूर वोट पर अभिमान असलियत में दिखी ढोल की पोल जुगाड़ बनाई जरुरत पड़ी आधे टूट गए तोड़ लिए को अप्रभावी दल बदल दलदल सत्ता बाले चुप विपक्ष का घमासान कानून में ही है प्रावधान नहीं एक जुट रख सके टूटने पर कोहराम नैतिकता खरीदफरोख्त की दुहाई फिर सब इतिहास राजनैतिक इलेक्सशन के बाद गठित सरकार वोटर बनती जनता सरकार तारणहार बड़े बड़े उलटफेर हो जाते राजनेता जब राजनीति की बिसात बिछाते दलबदल कानून फिर भी आस्था बदल जाती दल टूट कर नया धड़ा बना मान्यता पाते लोकतन्त्र के नाम कानून जो बनाए जाते।
विनोद कुमार शर्मा

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Click to listen highlighted text!
error: Content is protected !!