पुरुषोत्तम की महिमा – सुनीता तिवारी सरस – बाल लघु कथा

एक छोटे से गाँव में मोहन नाम का बालक रहता था। वह बहुत जिज्ञासु था और हमेशा अपने दादा जी से नई-नई बातें पूछा करता था। एक दिन उसने पूछा,
दादा जी, सब लोग पुरुषोत्तम मास की इतनी महिमा क्यों बताते हैं?
दादा जी मुस्कुराए और बोले, बेटा, यह वह समय होता है जब हम अपने अच्छे कर्मों पर ध्यान देते हैं और भगवान की भक्ति करते हैं।”
मोहन ने फिर पूछा, क्या इससे सच में कुछ बदलता है?
दादा जी उसे गाँव के बाहर एक बगीचे में ले गए। वहाँ कुछ पेड़ हरे-भरे थे और कुछ सूखे हुए। दादा जी बोले, देखो मोहन, जो पेड़ समय-समय पर पानी और देखभाल पाते हैं, वे हरे-भरे रहते हैं। और जिन्हें हम अनदेखा कर देते हैं, वे सूख जाते हैं।
मोहन ने सिर हिलाते हुए कहा, हाँ दादा जी, समझ गया।
दादा जी बोले, ठीक वैसे ही, पुरुषोत्तम मास हमें अपने मन और व्यवहार को सुधारने का अवसर देता है। इस समय हम अच्छे काम करते हैं, दूसरों की मदद करते हैं और अपने अंदर की बुराइयों को दूर करने का प्रयास करते हैं।
मोहन ने उसी दिन से निश्चय किया कि वह रोज़ किसी न किसी की मदद करेगा। कुछ ही दिनों में वह सबका प्यारा बन गया।
तब उसे समझ आया कि ‘पुरुषोत्तम की महिमा’ सिर्फ पूजा में नहीं, बल्कि अच्छे कर्मों और सच्चे मन में छिपी होती है।
सीख सच्ची भक्ति अच्छे कर्म और दूसरों की सहायता में होती है।
सुनीता तिवारी सरस




