रूदन -सीमा शुक्ला चांद

जीव के जन्म से मृत्यु पर्यन्त चलने वाली एक क्रिया रूदन अर्थात रोना है। आपको शायद आश्चर्य हो प्रत्येक जीव अपने जीवन का एक तिहाई हिस्सा बस रोते हुए ही गुजार देता है। जब एक जीव मात्र एक गर्भ में बहुत प्रतिक्षा के पश्चात अपने प्रथम कदम बढ़ाता है तब गर्भ धारण करने वाले स्त्री-पुरुष की आंखों में खुशी के अश्रु आ जाते हैं। ऐसा तब भी होता है जब प्रसव पीड़ा में पड़ी प्रसूता को उसके द्वारा रचे गये नये जीव से प्रथम बार मिलवाया जाता है।
वो प्रसूता अपनी शारीरिक पीड़ा से नहीं अपितु अपनी रचना को देख भावविभोर है रूदन करती है। वहीं दूसरी ओर वह जीव भी अश्रु धारा की मदद से धरा पर अपने इस आगमन की पुष्टि करता है। उसके इस क्रंदन के दो अर्थ होते हैं एक खुशी तथा दूसरा दुख खुशी इस बात की कि वह अब नौ माह की कठिनाइयां झेल कर धरा पर आ चुका है तथा दुख इस बात का की अब वह परमात्मा से बहुत दूर आ गया है । वह अपने रूदन से कभी अपनी पीड़ा कभी अपनी खुशी जाहिर करता है। जैसे जैसे वह जीव बड़ा होता जाता है उसका दायरा चाहे पारिवारिक हो सामाजिक हो या अन्य विस्तृत होता जाता है और उसकी रोने की प्रकृति उसके रोने की कलाओं मैं निखार आता जाता है।
जब वह धरा पर आया तो पोषण प्राप्त करने से अपने कष्टों की व्याख्या करने तक तरह तरह से रूदन के नित नवीन चित्र बनाता रहा। उसके रोने के इन तरीकों में कभी हमें वास्तविकता कभी दिखावा शामिल होता दिखने लगा । वह जीव अब धिरे धिरे माया के अधीन होने लगा। जब उसने चौपायों की तरह चलना प्रारंभ किया तो रूदन के एक और नवीन संस्करण का जन्म हुआ अब वो अपनी जिद की पूर्ति के लिए तरह तरह के स्वांग कर रोने लगा। दो पैरों पर खड़े होते ही रूदन के व्यापक दौर के प्रथम कदम मे प्रवेश कर फिर कभी द्बेष कभी ईर्ष्या कभी जलन ने उसे रूदन की शैलियां सिखाई। अब जब यही जीव युवा हुआ तब यह मिलन विरह छल कपट के परिप्रेक्ष्य में रोने लगा। प्रौढता प्राप्ती के साथ रूदन इस जीव के जीवन का अहम हिस्सा बन गया। अब यह जीव अपने द्वारा बुने गए सपने अपनी सीमाओं द्वारा उत्पन्न हार जीत अपनी आर्थिक शारिरिक पारिवारिक मानसिक सामाजिक स्थितियों की स्वंय विवेचना कर हर बार बस रूदन के नए नए स्वरूप ढूंढ रोता रहा। आपको जानकर आनंद होगा की इस जीव ने खुशी वाले क्षणों में रूदन की क्रियाएं बंद नहीं की इस तरह से रोने को उसने खुशी के अश्रु का नाम दिया।
वृद्धावस्था आते ही रोना या रूदन अपनी चरम पर पहुंच गया। जीव जन्म अकेले लेकर आया तथा अपने आप के सिवा कुछ नहीं लेकर जाएगा परन्तु वृद्धावस्था में आकर उसका अपने पारिवारिक सामाजिक आर्थिक तथा अन्य व्यवस्थाओं से जुड़ाव उसके प्रति पल रोने का कारण बना रहा। जीवन के अंतिम क्षणों में वो अपने भूतकाल को सोचकर अपने भविष्य को लेकर बस रोते रहा।
इस सबमें सबसे मजेदार बात यह है की किसी जीव की मृत्यु होने पर उसके अपने कहे जाने वालों का रोना। आप गौर करिए रोने में माहिर यह जीव अपने से जुड़े जीव के अंतिम यात्रा पर उसकी ठठरी पर रोता है यह कह कह कर “अब मेरा क्या होगा”। इस कथन से ही स्पष्ट है की यहां अन्य जीवों का रूदन मात्र जाने वाले जीव के चले जाने से उनसे दूर जाते हुए स्वार्थों के कारण है। 100 मे से 99 लोगो का रोना आंगन से ठठरी के अंतिम स्थल श्मशान जाते तक ही शांत हो जाते हैं। अग्नि मिट्टी जल जिस भी चीज से मृतक की देह का मिलन कराया जाता है उसके पश्चात वो 1 व्यक्ति भी रोना बंद कर देता है जो अभी तक शेष था। तो जो रोना जीव के आगमन से प्रारंभ हुआ वह जीव के गमन पर लगभग खत्म हो जाता है। जब तक उस जीव की आत्मा किसी अन्य देह के रूप में पुनः धरा पर ना आ जाए या फिर अपनी उत्पत्ति के स्रोत परमात्मा से ना मिल लें वह ब्रम्हांड में विचरण करती है और धरा पर मिले सभी माया-मयी रिश्तों को उनके विचारों को जान पुनः रूदन करती है।
वो सभी सामाजिक पारिवारिक संबंध जो जीव के जाने से रो रहे थे यदि उसी गए हुए जीव को पुनः देखने में सक्षम हो जाए तो उसी जीव को भूत कहकर चीख मारकर रोकर दूर भाग जाएंगे। यह कितना हास्यास्पद है की जिस जीव के आलिंगन से एक वक्त सूकून मिलता था उसके देह छोड़ने के पश्चात उसका आगमन भय का कारण हो जाता है। देह के साथ उस जीव को देखने के लिए रोते हैं पर देह विहीन वहीं जीव भूत हो जाता है।
तो इस पूरे के पूरे लेख ने रोने के विभिन्न आयामों पर चर्चा की है। हमें यह सोचना अवश्य चाहिए की इस धरा पर क्या हमारे जीवन का एकमात्र उद्देश्य रूदन करना ही है क्योंकी वास्तविकता में हम यही करते हैं।रूदन के प्रकार अलग हो सकते हैं परन्तु जीवन का एक तिहाई हिस्सा हम इस पर ही व्यय कर देते हैं और वो भी तब जब हमें ज्ञात है की एक कर्म के अलावा हमारे पास कुछ भी नहीं है हर घटना हर परिस्थिति एक तय समय में होकर रहेगी फिर उन घटनाओं या परिस्थितियों पर गहन विचार कर रोना क्यों।
हर धर्म के जीव की एक अलौकिक शक्ति में आस्था निहित है यहां तक की एक नास्तिक भी यह मानता है की कोई शक्ति कहीं तो है जो संसार से परे है और जब हमें किसी शक्ति पर भरोसा है तब उसकी इच्छा के अनुरूप जीवन जीना हमें इस रूदन से बचा सकता है पर माया से प्रेरित जीव फिर भी रूदन को अपने जीवन में अंगीकार करता है।
सीमा शुक्ला चांद




