स्वच्छता हमारी भी जिम्मेदारी — श्री श्री मिश्रा की कलम से
आज यूं ही मन हुआ.. पार्क की सैर की जाए.. फिर क्या.. कदम पर चले पार्क की ओर…
प्यारे से उद्यान में पैर रखते ही मानो तन मन में उमंग छा गई…!!
जिधर भी नजर जा रही थी सब तरफ हरियाली ही हरियाली दिख रही थी.. सुंदर हरि मखमली घास मानो एक सुखद अवसर का न्योता दे रही थी..। सुंदर टेढ़े मेढ़े ईंटों से बनी क्यारियों में छोटे बड़े रंगीन पुष्प मुस्कुरा रहे थे.. दूसरी तरफ नजर पड़ी तो झूलों पर छोटे बच्चे झूम रहे थे और अपनी ही मस्ती में मग्न थे.. सच बचपन भी कितना प्यारा होता है.. ना आज की चिंता.. कल की फिक्र…।
सभी तरफ दीवारों पर बस एक ही बात लिखी थी “स्वच्छता से हमारा नाता”
“पर्यावरण को बचाना हमारा धर्म”
दीवारों पर लिखे यह शब्द मन को बहुत सुकून दे रहे थे..।
किंतु साहस मेरी नजर एक बच्ची पर पड़ी जो कैंडी के छिलके अपने आसपास बिखेर रही थी.. जरा देर में लिया चना को खत्म करके पेपर के टुकड़ों को इधर-उधर फेंक रही थी..। पास ही खड़ी उसकी मां कुछ भी नहीं बोल रही थी..!वह इस तरह खुश हो रही थी मानो बहुत बड़ा सुंदर कार्य कर रही हो..।
यह सब देखकर मेरा मन व्यथित हो गया..। और यह सोचकर मनशर में पड़ गया दीवारों पर इतने बड़े-बड़े शब्दों में लिखें जो हमारे कर्तव्य की ओर इशारा करते हैं.. क्या वह पंक्तियां उस बच्ची की मां को नहीं दिख रहे थे..।
और जरा देर में वह कूड़ा फैलाते हुए पार्क से बाहर जाती हुई नजर आई..।
अंततः मेरा मन नहीं माना और मैं उन सभी टुकड़ों को उठाकर पास में रखे बड़े से कूड़ेदान में डाला जिस पर मोटे अक्षरों में लिखा था.. “कृपया मुझे प्रयोग करें।”
किंतु इन सब पंक्तियों को जो दीवारों पर एक स्लोगन संदेश के नाम पर लिखे जाते हैं उन पर नजर कुछ गैर जिम्मेदार नागरिकों की कम पड़ती है।
स्वच्छता रखना हमारी भी जिम्मेदारी है।
इस दिशा में सरकार कितने भी ठोस कदम उठा ले..किंतु जब तक देश का हर नागरिक अपने आप से शपथ नहीं लेता कि “स्वच्छता हमारा भी धर्म है…” तब तक यह उद्देश्य कभी सफल नहीं हो सकता।
स्वरचित श्री श्री मिश्रा




