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कश्मकश (लघुकथा) – राजेन्द्र परिहार”सैनिक”

 

राहुल हमेशा से यही मानता था कि पत्नी का स्थान घर में है,
बच्चों के साथ, परिवार के बीच। जब उसने नेहा से प्रेम विवाह किया था, तब उसने दुनिया से लड़कर उसे अपना बनाया था, लेकिन घर वालों की नाराज़गी आज भी दीवारों में जमी हुई थी।
नेहा की हर मुस्कान जैसे किसी अनकहे ताने से टकरा जाती।
नेहा पढ़ी-लिखी थी, आत्मनिर्भर बनना चाहती थी।
उसे एक अच्छी नौकरी का अवसर मिला, पर राहुल के मन में द्वंद्व शुरू हो गया। एक ओर उसका प्रेम था, दूसरी ओर समाज और परिवार की सोच।
वह जानता था कि घर वाले पहले ही नेहा को पूरी तरह अपना नहीं पाए हैं, और अब अगर वह नौकरी करने लगेगी तो ताने और बढ़ेंगे।
नेहा की आँखों में सपने थे—
अपने अस्तित्व को पहचानने के, कुछ बनने के।
राहुल की आँखों में डर था घर टूटने का, रिश्तों के बिखरने का।
हर रात दोनों के बीच खामोशी की एक लंबी दीवार खड़ी हो जाती।
एक दिन नेहा ने धीमे स्वर में कहा,
“क्या मेरा सपना इतना गलत है कि मुझे हर बार खुद को ही छोड़ना पड़े?”
राहुल चुप रहा, पर उसके भीतर सवालों का तूफान उठ चुका था। क्या वह सच में नेहा से प्रेम करता है अगर उसके सपनों को ही दबा दे? या फिर वह सिर्फ एक डर के साये में जी रहा है?
काफी सोचने के बाद उसने नेहा का हाथ थाम लिया।
“अगर तुम आगे बढ़ोगी, तो मैं तुम्हारे साथ चलूँगा…
चाहे रास्ता कितना भी कठिन क्यों न हो।”
उस क्षण राहुल की #कश्मकश खत्म नहीं हुई थी, लेकिन उसने एक निर्णय ले लिया था प्रेम को डर पर जीतने देने का।
वह मन में #कश्मकश होते हुए भी नेहा का साथ देने निकल गया।

राजेन्द्र परिहार”सैनिक”

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