विरासत – लघुकथा- सुनीता तिवारी सरस

पुराने घर की सफाई करते हुए अनन्या की नजर एक लकड़ी के संदूक पर पड़ी। संदूक पर धूल की मोटी परत थी, मगर ताला खुला हुआ था। उसने धीरे से ढक्कन उठाया तो भीतर कुछ पीले पड़े पत्र, एक पुरानी घड़ी और दादी की हस्तलिखित डायरी मिली।
अनन्या ने डायरी खोली। पहले पन्ने पर लिखा था “विरासत केवल जमीन-जायदाद नहीं होती, संस्कार भी विरासत होते हैं।”
वह पढ़ती गई। दादी ने अपने जीवन के संघर्ष, परिवार की खुशियाँ और कठिन समय में एक-दूसरे का साथ देने की बातें लिखी थीं। एक जगह लिखा था “घर बड़ा हो या छोटा, उसमें रहने वालों के दिल बड़े होने चाहिए।”
अनन्या की आँखें नम हो गईं। उसे याद आया, दादी हमेशा कहती थीं, “जिसके पास देने के लिए कुछ न हो, वह मुस्कान तो दे ही सकता है।”
उसी शाम परिवार के लोग संपत्ति बाँटने के लिए इकट्ठा हुए। चाचा पुराने मकान को बेचने की बात कर रहे थे। सब अपनी-अपनी हिस्सेदारी की चर्चा में व्यस्त थे।
अनन्या चुपचाप डायरी लेकर सबके बीच बैठ गई। उसने दादी की कुछ पंक्तियाँ पढ़कर सुनाईं। कमरे में अचानक खामोशी छा गई।
बड़े चाचा की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने कहा, “माँ ने हमें घर नहीं, परिवार बचाकर रखने की सीख दी थी।”
अगले दिन सबने निर्णय लिया कि मकान नहीं बिकेगा। उसके एक हिस्से में बच्चों के लिए पुस्तकालय बनेगा और आँगन में हर त्योहार पर पूरा परिवार एकत्र होगा।
अनन्या ने दादी की डायरी संदूक में वापस रख दी।
अब वह संदूक केवल पुरानी वस्तुओं का नहीं था, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेम, संस्कार और एकता की अमूल्य विरासत बन चुका था।
सुनीता तिवारी”सरस”




