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भूख और रोटी – डॉ संजीदा खानम शाहीन

 

भूख और रोटी, ये दो शब्द मानव जीवन का सबसे बड़ा सच हैं। रोटी सिर्फ गेहूँ का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि जीवन, सम्मान और अस्तित्व का प्रतीक है। भूख वह आग है जो इंसान से सब कुछ करवा देती है।

इतिहास गवाह है कि भूख ने बड़े-बड़े साम्राज्य गिराए हैं और क्रांतियों को जन्म दिया है। जब पेट खाली होता है तो नैतिकता, धर्म, कानून सब पीछे छूट जाते हैं। भूखा इंसान सबसे पहले रोटी मांगता है, उपदेश नहीं। प्रेमचंद ने ‘कफन’ में इसी भूख की विभीषिका को दिखाया है, जहाँ बाप-बेटे औरत की लाश छोड़कर रोटी और शराब पर टूट पड़ते हैं।

आज भी हालात बहुत बदले नहीं हैं। एक तरफ अन्न के गोदाम भरे पड़े हैं, तो दूसरी तरफ लाखों बच्चे कुपोषण से मर जाते हैं। होटलों में खाना फेंका जाता है और सड़कों पर लोग कचरे से रोटी बीनते हैं। यह विरोधाभास हमारे समाज का कड़वा सच है।

भूख सिर्फ गरीबी की समस्या नहीं है। यह असमान वितरण, बर्बादी और संवेदनहीनता का नतीजा है। किसान खेत में अन्न उगाकर खुद भूखा सोता है। मजदूर इमारतें बनाकर फुटपाथ पर रात काटता है। रोटी कमाने के लिए इंसान अपना घर-गाँव छोड़कर परदेस जाता है, अपमान सहता है, पर फिर भी दो वक्त की रोटी मुश्किल से मिलती है।

रोटी का सवाल दरअसल सम्मान का सवाल है। भूखे को रोटी देना पुण्य है, पर उससे बड़ा काम है ऐसी व्यवस्था बनाना जहाँ किसी को भीख न मांगनी पड़े। महात्मा गांधी कहते थे कि ईश्वर भूखे के सामने रोटी के रूप में ही प्रकट हो सकता है।

हमें समझना होगा कि जब तक आखिरी आदमी की थाली तक रोटी नहीं पहुँचती, तब तक विकास अधूरा है। भूख को मिटाना सिर्फ सरकार की नहीं, हम सबकी जिम्मेदारी है। अन्न का एक दाना भी बर्बाद न हो, यह संकल्प ही सच्ची मानवता है।

मौलिक, स्वरचित
डॉ संजीदा खानम शाहीन

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