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गर्मी की छुट्टियाँ और नानी-दादी का गाँव – प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”

(संस्मरण)

गर्मी की छुट्टियाँ आते ही हम बच्चों की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता था। परीक्षा समाप्त होते ही मन में बस एक ही ख्याल उमड़ता—कब नानी या दादी के गाँव जाने का दिन आएगा। उन दिनों छुट्टियाँ केवल आराम का समय नहीं होती थीं, बल्कि ढेर सारी खुशियों और यादों का खज़ाना लेकर आती थीं।
यात्रा की तैयारी कई दिन पहले ही शुरू हो जाती। कपड़ों के साथ-साथ उत्साह भी बक्सों में भर लिया जाता था। गाँव पहुँचते ही नानी-दादी का स्नेहिल आलिंगन सारी थकान दूर कर देता। उनका प्यार, उनकी बातें और दुलार मन को अपार सुख देते थे।
सुबह पक्षियों की चहचहाहट से नींद खुलती। दिन भर हम खेतों, बागों और गलियों में घूमते रहते। पेड़ों से आम तोड़ना, कुएँ से पानी निकालना और दोस्तों के साथ खेलना हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन जाता। शाम को दादी की कहानियाँ और नानी के हाथों के स्वादिष्ट पकवान छुट्टियों को और भी यादगार बना देते।
आज जब जीवन की भागदौड़ में वे दिन याद आते हैं, तो मन बरबस उन सुनहरे पलों में लौट जाना चाहता है। सचमुच, गर्मी की छुट्टियाँ केवल मौसम नहीं थीं, वे बचपन की सबसे खूबसूरत यादों का उत्सव थीं, जिनकी मिठास आज भी मन में बसी हुई है।

प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”

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