आलेख: अहंकार – लेखक: राजेश कुमार ‘राज’

मनुष्य के व्यक्तित्व में आत्मविश्वास और अहंकार के बीच अत्यंत सूक्ष्म अंतर होता है। आत्मविश्वास व्यक्ति को अपनी क्षमताओं पर विश्वास करना सिखाता है, जबकि अहंकार उसे अपनी सीमाओं से अनभिज्ञ बना देता है। आत्मविश्वास विनम्रता के साथ चलता है, परंतु अहंकार दूसरों को तुच्छ समझने की प्रवृत्ति उत्पन्न करता है। यही कारण है कि जहाँ आत्मविश्वास सफलता का आधार बनता है, वहीं अहंकार अनेक बार सफलता के शिखर से पतन की शुरुआत भी सिद्ध होता है।
अहंकार का जन्म प्रायः शक्ति, धन, ज्ञान, पद अथवा प्रसिद्धि के कारण होता है। जब व्यक्ति अपनी उपलब्धियों का श्रेय केवल स्वयं को देने लगता है और दूसरों के योगदान तथा दैव कृपा को भूल जाता है, तब उसके अंदर अहंकार जड़ें जमाने लगता है। शनै-शनै यह उसके विचारों, व्यवहार और निर्णयों पर अधिकार जमा लेता है। फलस्वरूप वह न दूसरों की सलाह को महत्व देता और न ही अपनी गलतियों को स्वीकार करता है। केवल स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने लगता है।
भारतीय संस्कृति और शास्त्रों में अहंकार को मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु बताया गया है। रावण, कंस और दुर्योधन जैसे अनेक व्यक्ति अत्यंत सामर्थ्यवान थे, लेकिन उनका घमण्ड ही उनके नाश का कारण बना। इसके विपरीत श्रीराम, श्रीकृष्ण और अनेक संत-महात्माओं ने असाधारण सामर्थ्य होने के बावज़ूद विनम्रता का मार्ग अपनाया। इतिहास और साहित्य दोनों इस सत्य के गवाह हैं कि विनम्रता मनुष्य को महान बनाती है, जबकि अहंकार महानता को नष्ट कर देता है।
सामाजिक जीवन में भी अहंकार संबंधों को कमजोर करता है। अहंकारी मनुष्य दूसरों की भावनाओं का सम्मान नहीं करता। अतः परिवार, मित्रता और कार्यस्थल के संबंधों में कड़वाहट उत्पन्न होने लगती है। इसके विपरीत विनम्र व्यक्ति सहज ही सबका विश्वास और स्नेह प्राप्त कर लेता है। यही कारण है कि नेतृत्व का वास्तविक आधार अधिकार नहीं, बल्कि विनम्र व्यवहार और संवेदनशीलता होती है।
अहंकार से बचने का सबसे प्रभावशाली उपाय आत्मचिंतन है। मनुष्य को समय-समय पर अपनी सीमाओं, अपनी भूलों और दूसरों के योगदान को याद रखना चाहिए। कृतज्ञता, सेवा-भाव और निरंतर सीखने की इच्छा व्यक्ति के भीतर विनम्रता को बनाए रखती है। जो व्यक्ति स्वयं को पूर्ण नहीं मानता, वही निरंतर आगे बढ़ता है और जीवन में वास्तविक सफलता प्राप्त करता है।
अंतिम निष्कर्ष यही है कि अहंकार एक ऐसा मीठा जहर है जो धीरे-धीरे मनुष्य के विवेक, रिश्ते-नातों और उपलब्धियों को समाप्त कर देता है। इसके विपरीत विनम्रता मनुष्य के व्यक्तित्व को गरिमा, सम्मान और सफलता प्रदान करती है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य की यह कोशिश होनी चाहिए कि वह उपलब्धियों पर गर्व करे, परंतु अहंकार को कभी अपने मन में किंचित भी स्थान न दे। यही स्वस्थ व्यक्तित्व, श्रेष्ठ चरित्र और सफल जीवन का सच्चा रास्ता है।
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