
रजिया सुल्ताना: तख़्त की इकलौती मलिका
कुछ कहानियाँ तलवारों से नहीं, हौसले से लिखी जाती हैं।
कुछ आवाज़ें शोर में नहीं, इतिहास के सन्नाटे को चीर कर गूँजती हैं।
यह कहानी दिल्ली के तख़्त पर बैठने वाली पहली और आख़िरी औरत की है, जिसने दुनिया को बताया कि बादशाहत का रिश्ता मर्दानगी से नहीं, काबिलियत से होता है।
कहानी :-
बहुत पुरानी बात है। दिल्ली की गद्दी पर सुल्तान इल्तुतमिश का राज था। उनके सात बेटे थे, पर उनके मन में एक कसक थी। कसक यह कि कोई बेटा ऐसा नहीं जो सल्तनत को संभाल सके। पर एक बेटी थी, रजिया। बचपन से ही रजिया घुड़सवारी करती, तलवार चलाती, और दरबार में बैठ कर इंसाफ की बातें सुनती।
जब इल्तुतमिश बीमार पड़े तो उन्होंने ऐलान कर दिया, “मेरे बाद रजिया सुल्तान बनेगी।” दरबार में सन्नाटा छा गया। अमीर और सरदार बुदबुदाने लगे, “औरत और हुकूमत? यह कैसे होगा?”
इल्तुतमिश के बाद बेटे रुकनुद्दीन को तख़्त पर बैठाया गया, पर वह राज चलाने के लायक नहीं था। दिल्ली की गलियों में लूट और दरबार में नाइंसाफी बढ़ गई। तब जनता खुद बोल पड़ी, “हमें रजिया चाहिए।”
रजिया लाल कपड़े उतार कर मर्दाने लिबास में आई। सिर पर पगड़ी बाँधी, कमर में तलवार लटकाई और हाथी पर बैठ कर दिल्ली की सड़कों से निकली। लोग हैरान थे। किसी ने औरत को इस शान से तख़्त की तरफ जाते नहीं देखा था।
सुल्तान बनते ही रजिया ने सबसे पहले इंसाफ का दरबार खोला। गरीब किसान हो या बड़ा अमीर, सबके लिए एक ही कानून। वह खुद घोड़े पर बैठ कर शहर का हाल देखने निकलती। बाजार में रुक कर बुढ़िया से पूछती, “माई, कोई तकलीफ?” सिपाही से पूछती, “तनख्वाह समय पर मिलती है?”
पर मुश्किलें कम न थीं। दरबार के कई अमीर यह मान ही नहीं पाते थे कि एक औरत उन पर हुक्म चलाए। उन्होंने बगावत कर दी। रजिया ने मैदान में उतर कर खुद तलवार चलाई। कहते हैं, जंग के मैदान में जब वह ललकारती थी तो बड़े बड़े सूरमा भी थर्रा जाते थे।
रजिया ने चार साल राज किया। चार साल में उसने बता दिया कि पर्दा औरत को कमजोर नहीं करता, और ताज मर्द का ही हक नहीं होता। आखिर में अपनों की दगा और साजिशों ने उसे हरा दिया। पर जाते वह एक लकीर खींच गई। आज भी जब कोई लड़की अपने हक के लिए खड़ी होती है, तो कहीं न कहीं रजिया की परछाई उसके साथ चलती है। तख़्त छिन सकता है, पर हौसला नहीं। यही रजिया सुल्ताना की असली जीत थी।
नरसा राम जांगु
डीडवाना_कुचामन




