बिखरता आभा मंडल – विनोद कुमार शर्मा

राजनीति हो या सामाजिक जीवन एक स्थिति परिस्थिति एसी आ ही जाती जब आपकी नीतियां और निर्णयों से जनता प्रभावित होना बंद हो जाती विश्व में धर्म संप्रदाय भौगोलिक बनावट अलग हो सकती प्रकृति स्थानीय कारकों के कारण उसी रूप में संरक्षण देती है लेकिन असंतुलित उपयोग से वह भी विपरीत परिणाम देती है
आज विश्व में शीत युद्ध नहीं बल्कि तेल का खेल और वर्चस्व की लड़ाई तीसरे विश्व युद्ध की ओर जाती दिख रही जहां मानव कल्याण और सुख शांति जिओ और जीने दो की अवधारणा का आभामंडल बिखरता दिख रहा तथा कथित स्वयंभू बड़े देशों के नेता स्तर हीन राजनीति से ग्रसित हो युद्ध की ओर बढ़ रहे और मानवता का खून बहाने में हिचक भी नहीं रहे सत्ता के मद में अंतरराष्ट्रीय संगठन uno लाचार लचर और पंगु बन मूक हो रहा तथा उसके अस्तित्व पर ही संकट खड़ा हो गया छोटे छोटे देश आर्थिक मंदी और संसाधनों की कमी के कारण चुप हैं बड़े देश खेमेबाजी में लगे बारूद रक्त पिपासु बनी नीति और न्याय का अभाव निरंकुशता को बड़ा रहा बलोचों का दमन हो या रोहंगियों का स्तर हीन अभावों से भरा जीवन या पलायन में सैकड़ों समुद्र में समाती अकस्मात मौत को गले लगाती जिंदगियां या नेताओं की तकरार में बारूद से जल्दी जिंदगियां झकझोर रहीं उनको शांति सहअस्तित्व का जीवन मिले कोई पहल नहीं हो रही सारा विश्व किसी ईश्वरीय चमत्कार के भरोसे उम्मीद पर की शांति आएगी मानवता बचाएगी की उमीदों के बीच संघर्ष में लगा।
विनोद कुमार शर्मा




