हमारे राष्ट्र के असली हीरो : सफाई कर्मचारी – उर्मिला मोर बरहामपुर ओडीसा
किसी भी शहर की पहचान उसकी इमारत चौड़ी सड़कों या चमकती रोशनियों से नहीं बल्कि उसकी स्वच्छता और व्यवस्था से होती है जब कोई व्यक्ति किसी शहर में प्रवेश करता है तो सबसे पहले उसकी नजर वहां के साफ सुथरा वातावरण और नागरिक अनुशासन पर जाती है स्वच्छ शहर केवल सुंदर ही नहीं दिखते बल्कि वह बेहतर स्वस्थ सुरक्षित जीवन और सभ्य समाज के भी प्रतीक है लेकिन इस स्वच्छता के पीछे जिन लोगों का सबसे बड़ा हाथ है वह अक्सर समाज की चर्चा और सम्मान से दूर रह जाते हैं ।वह हमारे सफाई कर्मचारी है।
हाल ही में विभिन्न नगरों में सफाई कर्मचारियों की हड़ताल से लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया यदि यह कर्मचारी अपना काम बंद कर दें तो शहरों का जीवन कितना अस्त व्यस्त हो जाएगा कुछ ही दिनों में सड़कों पर कचरे का ढेर लग जाएगा और नाले जाम हो जायेगे,बदबू फैलने लगेगी और बीमारी का खतरा मंडराने लगेगा।लोगों को पहली बार महसूस हुआ जिनसफाई कर्मचारियों को हम सामान्य इंसान समझते हैं वास्तव में वही शहर की धड़कन है।
बिडम्बना यह है हम आधुनिकता और विकास के बड़े-बड़े दावे तो करते हैं लेकिन नागरिक जिम्मेदारियां के मामले में अभी भी बहुत पीछे हैं हमारे शहरों में बड़ी संख्या में लोग सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फेंकना , प्लास्टिक सड़क पर छोड़ देना और गंदगी फैलाना सामान्य बात समझते हैं ।घर के भीतर सफाई करके वे कचरा सड़क पर ऐसे फेंक देते हैं जैसे डस्टबिन ही हो।
विकसित देशों में नागरिक स्वयं स्वच्छता के प्रति जागरूक रहते हैं वहां पर सड़क पर कचरा फेंकना एक सामाजिक अपराध है लेकिन हमारे यहां स्वच्छता को अभी भी सरकारी सफाई कर्मचारी और नगर निगम की जिम्मेदारी समझीजाती है जब तक समाज स्वयं स्वच्छता को अपनी आदत नहीं बनाएगा तब तक किसी सरकारी अभियान की सफलता अधूरी रहेगी।
सफाई कर्मचारियों का जीवन संघर्षों से भरा रहता है वह सुबह-सुबह जब काम शुरू करते हैं तब अधिकांश लोग नींद में रहते हैं तेज गर्मी ,कडाकेकी सर्दी बरसात या महामारी हर परिस्थिति में वह सड़कों, गलियों और नालियो की सफाई करते हैं कई बार उन्हें बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के बेहद जटिल परिस्थितियों में भी काम करना पड़ता है ।सीवर की सफाई करते समय रिसती जहरीलीगैसों के कारण हर वर्ष कई कर्मचारियों की मृत्यु हो जाती है।
कोविद-19 महामारी के दौरान जब पूरा देश घरों में बंद था तब डॉक्टर पुलिस कर्मियों और सरकार सफाई कर्मचारियों ने अपनी जानजोखिम में डालकर समाज को सुरक्षित रखने का कार्य किया इस समय लोगों ने ताली और थाली बजाकर इनका सम्मान तो किया लेकिन समय बीतने के साथ हम फिर उन्हें भूल गए।
समाज का एक बड़ा वर्ग अभी भी सफाई कार्यकर्ता को हेय दृष्टि से देखता है यदि यही सरकारी सफाई कर्मचारी एक दिन काम बंद कर दें तो पूरे शहर की व्यवस्था ठप्प पड़ जायेगी इसलिए उनका कार्य केवल नौकरी ही नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन की रक्षा का कार्य भी है ।सबसे बड़ा पीड़ादायक दृश्य तब दिखाई देता है जब सड़कों पर फैले कचरो में गाय अपना भोजन खोजती है ।भारतीय समाज में एक तरफ तो गाय को माता का दर्जा दिया जाता है लेकिन वास्तविकता यह है यदि यही गाय प्लास्टिक सडाभोजन और जहरीला कचरा खाने को मजबूर रहती है। यह कैसी संवेदनशीलता है।
हमें यह समझना होगा सफाई केवल नगर निगम की जिम्मेदारी नहीं है हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह अपने आसपास स्वच्छता बनाए रखें और दूसरों को भी प्रेरित करें ।साथ ही सफाई कर्मचारियों के अधिकारों और सम्मान की रक्षा भी उतनी ही आवश्यकता है उन्हें उचित वेतन स्थाई रोजगार स्वास्थ्य सुविधाएं और सुरक्षा उपकरण उपलब्ध करना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
शिक्षा व्यवस्था में भी स्वच्छता और नागरिक जिम्मेदारी को व्यावहारिक रूप से शामिल करने की आवश्यकता है बच्चों को केवल किताबों में स्वच्छता का पाठ पढ़ाने से काम नहीं चलेगा बल्कि उन्हें व्यवहार में भी इसे अपनाने की प्रेरणा देनी होगी
हमें यह भी समझना होगा स्वच्छता केवल सौंदर्य का विषय नहीं है बल्कि स्वास्थ्य और सभ्यता का प्रश्न है ।गंदगी से मच्छर मक्खियों सेअनेक बीमारियां फैलती है ।अस्वच्छ वातावरण बच्चे , बुजुर्गों और बीमारो के लिए सबसे अधिक खतरनाक होता है ।इसलिए सफाई कर्मचारियों का सीधा कार्य सीधे-सीधे समाज के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है
सफाई कर्मचारी वास्तव में हमारे देश के असली हीरो है वह बिना किसी विशेष सम्मान या प्रसिद्धी की अपेक्षा प्रतिदिन हमारे जीवन को बेहतर बनाने में लगे रहते हैं। उनकी मेहनत से ही हम शहर में सांस लेते हैं सड़के चलने योग्य होती है और समाज स्वस्थ रहता है
यदि हम सचमुच एक संवेदनशील और विकसित समाज बनाना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें सफाई कर्मचारियों के प्रति अपनी सोच बदलनी होगी उन्हें सम्मान देना ,उनकी समस्याओं को समझना और स्वच्छता को अपनी जिम्मेदारी बनाना ही सच्ची नागरिकता है यही वह रास्ता है जो हमारे शहरों को केवल चमकदार ही नहीं बल्कि मानवीय और संस्कारित भी बनाएगा
उर्मिला मोर
बरहामपुर ओडीसा




