हिन्दी: संस्कृति की स्मृति, भविष्य की भाषा’ – -डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’ अहमदाबाद,गुजरात।
वेदों की ऋचाओं से, उपनिषदों के ज्ञान से,
हर अक्षर में बसी
संस्कृति की पहचान से।
राम-कृष्ण की गाथा,
कबीर के दोहे,
रहें हैं सदियों से हम सब को जोड़ें।
सांस्कृतिक धरोहर का यह अमूल्य खज़ाना ,
हिन्दी के आँचल में इनको हैं समाना ।
अतीत का गौरव,
वर्तमान की शक्ति,
हर भाव को करे जो शब्दों में अभिव्यक्ति।
प्रेम, वीर, करुणा और हास्य का रस,
हिन्दी सागर के हर शब्द में रस।
अस्मिता की प्रतीक,
राष्ट्र की पहचान ,
हिन्दी हमारी आत्मा की शान ।
समय के साथ चलती,
नित नई ऊँचाइयों को छूती,
आधुनिकता की राह में,
नए रूप में सजती।
तक़नीक के युग में भी, अपना वर्चस्व है पाती,
हर दिल में बसकर,
हिन्दी है मुस्काती।
भविष्य की संभावनाओं का यह द्वार खोलेगी,
दुनिया के मंच पर भी,
हिन्दी ही बोलेगी।
हिन्दी केवल भाषा नहीं, भावना का एक नाम ,
अस्मिता की आवाज़, समय का पैग़ाम ।
संस्कृति की स्मृति,
भविष्य की भाषा,
हिन्दी में छिपी,
हर आशा अभिलाषा।
इसकी समृद्धि में ही,
हमारा उत्थान ,
हिन्दी हमारी शान ,
हिन्दी हमारा मान ।
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद,गुजरात।




