स्वार्थ की दौड़ में खोती मानवता – सुमन दूबे साऊंखोर बड़हलगंज गोरखपुर

आज का युग भौतिक सुख-सुविधाओं और प्रतिस्पर्धा का युग बन गया है। अधिकांश लोग धन, शोहरत और व्यक्तिगत सफलता प्राप्त करने की दौड़ में इतने व्यस्त हो गए हैं कि मानवता और सामाजिक उत्तरदायित्व पीछे छूटते जा रहे हैं। एक ओर जहाँ चिकित्सा विज्ञान ने अत्यधिक प्रगति की है, वहीं दूसरी ओर अनेक गरीब और असहाय लोग दवा तथा उचित उपचार के अभाव में अपने प्राण त्यागने को विवश हैं। यह स्थिति समाज की संवेदनहीनता को दर्शाती है।
प्राचीन भारतीय संस्कृति में परोपकार और सेवा को सर्वोच्च धर्म माना जाता था। लोग अपने सुख के साथ-साथ दूसरों के कल्याण का भी ध्यान रखते थे। किंतु आज स्वार्थ की भावना बढ़ती जा रही है। व्यक्ति अपने निजी जीवन, करियर और सुविधाओं तक सीमित होता जा रहा है। परिणामस्वरूप सामाजिक सहयोग और मानवीय संवेदनाएँ कमजोर पड़ रही हैं।
आवश्यकता इस बात की है कि हम केवल अपनी उन्नति तक सीमित न रहें, बल्कि समाज के कमजोर और जरूरतमंद लोगों की सहायता के लिए भी आगे आएँ। सच्ची प्रगति वही है जिसमें मानवता और करुणा दोनों का समावेश हो।
सुमन दूबे साऊंखोर
बड़हलगंज गोरखपुर




