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“मेरा गाँव, मेरा बचपन” – संस्मरण -सुमन दूबे साऊंखोर बड़हलगंज गोरखपुर

 

बचपन जीवन का सबसे सुंदर और निष्कलुष (किसी प्रकार का दोष न हो) समय होता है। जब भी मैं अपने बीते दिनों को याद करती हूँ, तो मेरा गाँव और वहाँ बिताया गया बचपन आँखों के सामने किसी मधुर स्वप्न की तरह उतर आता है।
मेरा गाँव चारों ओर से हरे-भरे बगीचों से घिरा हुआ है। दूर-दूर तक फैले आम, अमरूद, नीम और जामुन के पेड़ मानो प्रकृति की गोद का एहसास कराते हैं। छोटे-छोटे पौधे और बड़े-बड़े वृक्ष गाँव की शोभा को और भी बढ़ा देते हैं। “बड़े मजे की बात यह है कि मेरा गांव चारों तरफ पानियों से घिरा हुआ है इसलिए उसका नाम चारपानी भी हैं।”
सुबह होते ही पक्षियों की मधुर चहचहाहट वातावरण को संगीत से भर देती थी। ठंडी हवा पेड़ों की पत्तियों से टकराकर मन को अनोखी शांति देती थी। हम सभी बच्चे उसी बगीचों में खेलते, दौड़ते और कभी पेड़ों की छाँव में बैठकर कहानियाँ सुनते थे। आम के मौसम में पेड़ों पर चढ़ना और कच्चे आम तोड़कर खाना हमारे बचपन की सबसे प्यारी यादों में से एक है।
मेरे गाँव में एक छोटा-सा प्राइमरी स्कूल भी था। “वह आज भी है” वही स्कूल मेरे जीवन की पहली पाठशाला रही। मिट्टी से सने आँगन, लकड़ी की बेंचें और अध्यापकों का स्नेह आज भी मन को भावुक कर देता है। कक्षाओं से बाहर निकल कर छायादार वृक्षों के आंगन में बैठकर हमारे अध्यापक हमें पढा़ते ।
स्कूल जाते समय रास्ते में पेड़ों की हरियाली और खेतों की खुशबू मन को आनंद से भर देती थी। वहाँ पढ़ाई के साथ-साथ संस्कार और अपनापन भी मिला।
गाँव के लोग बहुत सरल और प्रेमपूर्ण थे।हर किसी के सुख दुःख में साथ खड़े रहते,हर त्योहार मिल-जुलकर मनाया जाता था। शाम के समय बुज़ुर्ग चौपाल पर बैठते और हम बच्चे खेल-कूद में मग्न रहते। उस समय न किसी बात की चिंता थी और न ही जीवन में कोई बनावट।
एक समय था जब कड़ाके की ठंड पड़ती थी तो उच्च प्राथमिक विद्यालय के प्राध्यापक हमारे ही घर के बगल में पढ़ाते थे , जो रात्रि में बच्चों को अपने घर पर बुलाते थे और भोर में उठाकर उन बच्चों को पढ़ाते थे।वह कितना आनंदपूर्ण समय था, कितना अपनापन था।
आज भले ही समय बदल गया हो, लेकिन मेरा गाँव और वहाँ बिताया गया बचपन मेरी स्मृतियों का सबसे अनमोल हिस्सा है। जब भी मैं उन दिनों को याद करती हूँ, मन फिर से उसी हरियाली, उसी मासूमियत और उसी स्नेहभरे वातावरण में खो जाती हूं। सचमुच, मेरा गाँव और मेरा बचपन मेरे जीवन की सबसे सुंदर धरोहर हैं।

सुमन दूबे साऊंखोर
बड़हलगंज गोरखपुर

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