बारिश की वो रात – रमेश शर्मा

सुरेश जयपुर में डाक्टर थे उनका बड़ा नर्सिंग होम था। उनकी पत्नी गृहणी थी। डाक्टर सुरेश के एक बेटा और बेटी थे। बेटी सुगंधा साफ्टवेयर इंजीनियर थी जिसका विवाह उन्होंने उसकी पंसद के लड़के रवि भी साफ्टवेयर इंजीनियर था जो उसके साथ बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करता था के साथ कर दिया था दोनों बैंगलोर में रह रहे थे। बेटा पूना में अभी एम बी बी एस के अंतिम वर्ष में था।
सुरेश जी बांदीकुई से बीस किलोमीटर आगे बसवा गाँव के रहने वाले थे। आज उनके बड़े भाई साहब की बच्ची की शादी में गाँव जाना था। सोचा दो घंटे का रास्ता है । आज नर्सिंग होम में पेशेंट देखते देखते देर हो गई।शाम को अपनी पत्नी के साथ अपनी गाड़ी से जयपुर से निकले। अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। दौसा से आगे बारिश के बीच अचानक कार बंद हो गई। बड़ी मुश्किल में थे क्योंकि आसपास कोई दुकान दिखाई नहीं दे रही थी। और चाय की तलब लग रही थी। उन्हें एक छोटी सी झोपड़ी में खाने पीने का सामान रखा दिखाई दिया। वे वहाँ पहुंचे और आवाज जी कोई है। दो तीन आवाज देने के बाद एक महिला निकल कर आई। बोली क्या चाहिए। उन्होंने कहा दो चाय और बिस्कुट का पैकेट। इतनी देर में वो महिला अंदर गई और दो चाय और बिस्कुट का पैकेट लेकर आई। चाय बहुत स्वादिष्ट थी अदरक और लोंग की खुशबू आ रही थी।उन्होंने पूछा कितने पैसे हुए महिला बोली जी बीस रुपये। वह बोले और चाय के, महिला बोली जी चाय के पैसे नहीं लेते। हम चाय नहीं बनाते। आपको देखा इस बरसात में तो मैंने बेटी के लिए थोड़ा दूध था उसकी चाय बना दी।
मेरे पति मजदूरी करते हैं दो दिन से बुखार आ रहा है इसलिए दैहाड़ी पर नहीं जा सके। वे बोले अब बच्ची को क्या पिलाओगी।उस महिला ने कहा कोई बात नहीं। कल सुबह दूध लाकर पिला दूंगी। उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। आज के समय में ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने अतिथि की सेवा के लिए बच्ची के लिए रखे दूध की चाय बना कर दे दी।
सुरेश जी हमेशा कार में मेडिकल किट में आवश्यक दवाईयां रखते थे। उन्होंने पूछा क्या मैं आपके पति को देख सकता हूँ मैं डाक्टर हूं वह उन्हें पीछे एक कमरे में ले गई। वह सर्दी से कांप रहे थे। बुखार तेज था। सुरेश जी ने एक दो इंजेक्शन लगाये और एक बोटल ड्रिप चढ़ाई। उस व्यक्ति का बुखार दो घंटे में उतर गया।
सुरेश जी और उनकी पत्नी कार के पास आये तो कार स्टार्ट हो गई। उस महिला ने उन्हें धन्यवाद दिया। वे सोचने लगे कि आज जीवन का एक सबक एक साधारण महिला से सीखने को मिला।
जयपुर आकर उन्होंने अपने नर्सिंग होम में काऊंटर पर बैठी नर्स से कहा आज के बाद आप सिर्फ पर्ची बनाना और फीस मैं स्वयं लूंगा। अब वे मरीज की आर्थिक स्थिति देखकर फीस लेने लगे।
रमेश शर्मा




