लघुकथा: किस्मत का खेल कथाकार: राजेश कुमार ‘राज’

राजन और सुरेश इंटरमीडिएट कालेज के विद्यार्थी थे। दोनों पढ़ने में होशियार थे लेकिन सुरेश पढ़ाई में अच्छा होने के साथ-साथ वाकपटु और अंग्रेजी भाषा में दक्ष था। वह उस समय कालेज में अपने प्राध्यापकों के साथ अंग्रेजी भाषा में बात करने वाला अकेला विद्यार्थी था। अतः सुरेश अंग्रेजी के प्राध्यापक की ऑंखों का तारा था। इसके विपरीत राजन एक अंतर्मुखी छात्र था। कम बोलता था लेकिन वह पूरी कक्षा में सबसे अधिक अंक हासिल किया करता था। लेकिन फिर भी सुरेश सबका चहेता था। सब यही कहते थे कि एक दिन वह बहुत बड़ा अफ़सर बनेगा।
दिन, महीने और साल बीतते गए। दोनों ने अपनी
स्नातक की पढ़ाई भी पूरी कर ली और अपने-अपने रास्ते चल पड़े। तत्पश्चात राजन कर्मचारी चयन आयोग की प्रतियोगी परीक्षा पास कर भारत सरकार के गृह मंत्रालय में सब इंस्पेक्टर स्तर की नौकरी पा जाता है। उसकी सरकारी सेवा अखिल भारतीय स्तर पर स्थानान्तरण योग्य होने के कारण वह विभिन्न प्रदेशों में और शहरों में पोस्टिंग पर रहा। उसका अपने बचपन, स्कूल और कालेज के दोस्तों से सम्पर्क लगभग कट चुका था। बस कभी-कभार अपने गृह नगर में उसका जाना होता था। गृह नगर के एक ऐसे ही प्रवास के दौरान एक बाबा जी, जिसको राजन भी जानता था, के आश्रम में उसकी मुलाकात सुरेश से हो गई। उस से बातचीत कर के राजन को पता चला कि उसकी फर्राटेदार अंग्रेजी और बौद्धिक क्षमता के बावजूद वह कोई सरकारी नौकरी नहीं पा सका। उस से बात कर और उसके हालात जान कर राजन को बहुत बुरा लगा।
अब राजन अपनी राजकीय सेवा से निवृत्त हो चुका है। आज भी कभी-कभी उसे अपने सहपाठी सुरेश की याद आ जाती है कि कैसे एक होनहार विद्यार्थी किस्मत के खेल में हार गया।
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