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असहमति का होना भी जरूरी है – राजेन्द्र परिहार “सैनिक”

 

जीवन की विषमताओं को समतावान बनाने के लिए,, अपनी क्षमताओं को समृद्ध बनाने के लिए अत्यावश्यक है सहमति व विश्वास का होना किंतु अति सर्वत्र वर्जयते.. अर्थात् अत्यधिक विश्वास भी जीवन में ऐसे हालात पैदा कर देता है या ऐसी परिस्थिति में डाल देता है कि निकलने के सारे द्वार बन्द हो जाते हैं और जीवन एक बोझ बनकर रह जाता है। ये विपरीत परिस्थितियां उन्हीं के साथ उत्पन्न होती है,जो बिना सोचे विचारे हां कहने में विश्वास रखते हैं और यही अंध विश्वास उन्हें ऐसी गहरी खाई में धकेल देता है जहां से निकल पाना नामुमकिन हो जाता है और वो उस वक्त को कोसते रहते हैं जब उन्होंने बिना सोचे समझे सहमति जताई थी। कोई कितना भी खास और विश्वासपात्र क्यों न हो विवेक को सदैव जाग्रत रखिए।सहमति जताने से पहले विभिन्न पहलुओं पर विचार कीजिए और यदि ज़मीर इंकार कर रहा है तो आप भी स्पष्ट रूप से इंकार कर दीजिए।

विश्वास और अपनापन जताकर कितनी ही स्त्रियों को बहला फुसलाकर वैश्या बना दिया जाता है और कितनी ही लड़कियों को बाज़ार में बेच दिया जाता है। कितने ही बच्चों को अंग भंग कर भिखारी बनकर बैठा दिया जाता है। दोष किस्मत का नहीं सिर्फ अपनी एक बिना सोचे समझे दी गई सहमति का होता है। बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल कीजिए और बे-हिचक ना कहने की हिम्मत जुटाइए।

राजेन्द्र परिहार “सैनिक”

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