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लघुकथा: मन का बोझ – श्री पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’ (सुरेंद्रनगर-गुजरात)

 

मन का बोझ अपने भीतर दबाकर रखना पड़ता है। यह मन का बोझ दिखाई नहीं देता लेकिन मनुष्य की शांति खुशी और आत्मविश्वास को प्रभावित करता है।मन का बोझ मनुष्य को जीने नहीं देता।मन के बोझ की असर दिलों दिमाग पर पड़ती है।एक गांव में अजय और आरती दोनों मित्र रहते थे।साथ पढ़ लिखकर बड़े हुए थे। धीरे धीरे वो रिश्ता प्रेम में बदलता गया।अजय और आरती के प्रेम के बार में जब आरती के माता पिता को पता चला तब आरती के मम्मी ने कहा; ‘बेटा अजय अच्छा लड़का है।गरीब स्थिति का है।उनका खानदान हमारे जैसा नहीं तेरे पिताजी वो बात हरगिज नहीं मानेंगे। फिर भी मैं तेरे पिताजी को बात करूंगी। समझाने की कोशिश करूंगी’। एक बार आरती की मम्मी ने उसके पिताजी को कहा;’हमारी बेटी और अजय एक दूसरे को चाहते हैं। बात लग्न तक पहुंच गई है।यह सुन कर आरती के पिताजी भड़क उठे और कहा; ‘अरे आरती तो ना समझ है तुम भी इसकी बातों में आ गई। ऐसे गरीब परिवार में हम अपनी बेटी को नहीं देंगे। समाज क्या सोचेंगे उसका भी तनिक विचार किया है।
आरती के पिताजी जक्की स्वभाव के थे।वो यह बात माननेवाला में नहीं था।उसने आरती को पास बुलाया और कहा;’ बेटा ये रिश्ता मुझे मंजूर नहीं है। हमको अपने भविष्य के बारे में सोचना चाहिए।और हां कोई भी गलत कदम भी मत उठाना। मैंने तेरे लिए अच्छा रिश्ता ढूंढ रखा है। धनवान और खानदान परिवार है। इकलौता लड़का है।तुं वहां राज करेगी।आरती को पता भी नहीं था और उसकी सगाई वहां कर दी। झट मंगनी पट ब्याह तत्काल लग्न भी करना तय कर लिया। आरती ने जब सगाई की बात जानी तो उसके पैरों तले जमीन फिसल गई। आरती लचार थी। करें तो भी क्या करें। वो विचार करने लगी;’अजय ही मेरे मन सर्वस्व है। मैं दूसरे लड़कों के बारे में सोच भी नहीं सकती। क्या करूं। विवाह के थोड़े दिन ही शेष थे। उसके मन में घमासान युद्ध मचा।भागकर शादी करने का इरादा भी किया। उसके पास कोई रास्ता बचा नहीं था। एक बार आरती अकेली घर में थी।पंखे पर दुपट्टा बांधकर आत्महत्या कर ली।
उसके पिताजी ने यह जाना तो खूब दुःख हुआ। वह सोचने लगे काश मैंने आरती की बात मानी होती तो यह दिन देखने ना होते। बेटी को खोने की बात उसके दिमाग में से हटती नहीं थी।यह मन का बोझ लेकर आरती के पिताजी आज भी पश्चाताप में जी रहे हैं।परिवार संगीत की तरह है जिसमें कुछ स्वर ऊँचे हैं और कुछ नीचे
लेकिन जब सब मिलते हैं तब एक खूबसूरत संगीत बनता है और एक खुशहाल परिवार बनता है। आज के माता-पिता को यह सोचना चाहिए कि हमारे संतान की भलाई किस्म है।

श्री पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’
(सुरेंद्रनगर-गुजरात)

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