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आलेख :- अहंकार विनाश का मूल – श्री पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’ (सुरेंद्रनगर- गुजरात)

 

अहंकार विनाश का मूल है।अहंकार मानव मूल्यों को समाज में गिराता है।अपना नैतिक पतन करवाता है।अहंकार एक कागज की नाव है थोड़ी सी लहरों में डूब जाती है।मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी यदि कोई है तो यह है अहंकार।अहंकार मनुष्य की सोच को संकीर्ण बना देते हैं।जिसको अहंकार घर कर ले उसका पतन की ओर रास्ता दिखा देता है। अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।अहंकार यानी मैं ही सब कुछ जानता हूं।मैं कभी गलत नहीं हो सकता हूं।मैं ही सबसे महान हूं।मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूं।अहंकार से कुछ लाभ नहीं होता है।आप कुछ नया सिख भी नहीं सकते हैं।मानव मतलबी हो जाते हैं। मनुष्य की व्यक्तित्व में अनेक गुण और अवगुण होते हैं।जहां नम्रता करुणा प्रेम दया सहन शीलता जैसे गुण महान है।वही काम क्रोध मोह लोभ राग द्वेष अहंकार जैसा अवगुण भी होता है।ये सद्गुणों को धीरे धीरे नष्ट कर देता है।दूसरों की बातें सुनना छोड़ देते हैं।परिणाम स्वरुप अपना विकास रुक जाता है।मनुष्य अहंकारी होने के कारण संबंधों में भी कटुता आती है और सफलता धीरे धीरे नष्ट हो जाती है। मनुष्य शक्तिशाली ज्ञानी होकर भी अहंकार से उनका पतन हो जाता है।धन संपत्ति बल बुद्धि ज्ञान मान सम्मान इज्जत प्रतिष्ठा के कारण मनुष्य में अहंकार आ जता है।अपने आप को महान और ताकत वर समझने लगता है।अहंकार में वशीभूत होकर अपना मानवता का अस्तित्व भूल जाता है।अहंकार व्यक्ति को आत्ममुग्ध बना देता है।वह न तो आलोचना स्वीकार कर सकता है और नहीं दूसरों से सीखने की क्षमता बनाए रख पाता है। परिणाम स्वरुप उनके संबंध कमजोर पड जाते हैं। उसका विकास रुक जाता है। इसके विपरीत विनम्र व्यक्ति जीवन भर सीखता रहता है।वह निरंतर आगे बढ़ता है।अहंकार मनुष्य के व्यक्तित्व का वो दोष जो उसके विवेक पर पर्दा डाल देते हैं।आज के इस भौतिकतावादी प्रगतिशील युग में व्यक्ति दिखावे की ओर अग्रसर होता हुआ दिखाई देता है।अपनी धनाढ्यता वैभवता का प्रदर्शन करते हैं।अत: उसमें अहंकार आ जाता है।
फल से लदा वृक्ष सदैव झुकता है जबकि सूखा वृक्ष अकड़कर खड़ा रहता है। मानव जीवन का भी यह शाश्वत सत्य है। जितना बड़ा व्यक्तित्व होता है उतना ही अधिक विनम्रता उसमें होती है और जितना अहंकार बढ़ता है उतना ही पतन निकट आता जाता है।अहंकार सेजन का पेड़ की तरह है जो फल आने पर अपने मद में चकचुर होकर उड़ता है। और जड़ से ही खत्म हो जाता है।धन और ताकत बड़ी नशीली चीज है।कम हो तो मजबूर कर देती है और ज्यादा हो तो मगरूर बना देती है।अहंकार की मुट्ठी बांधकर कुछ भी हासिल नहीं हो सकता है।यदि कुछ प्राप्त करना है तो विनम्र बनो।अपने वैभव पर गुमान नहीं करना चाहिए। लक्ष्मी चलायमान है अहंकार वैमनस्यता को बढ़ावा देती है। धन दौलत किसी गलत राह पर ले जा सकता है। इसीलिए जीवन में अहंकार को मत पालना।

“अहंकार में तीन गए रावण दुर्योधन कंस,
न दिखा हो तो देख लो किसी का न रहा वंश।

श्री पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’
(सुरेंद्रनगर- गुजरात)

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