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शीर्षक: सबसे बड़ा है रोग — क्या कहेंगे लोग

 

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज में रहता है, लोगों के बीच उठता-बैठता है और अपने जीवन के अनेक निर्णय समाज को ध्यान में रखकर लेता है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि समाज से ही उसे पहचान, सुरक्षा और सहयोग मिलता है। लेकिन जब समाज का डर इतना बढ़ जाए कि व्यक्ति अपने मन की बात कहने, अपनी इच्छा के अनुसार काम करने और अपने सपनों को पूरा करने से भी डरने लगे, तब यह डर एक रोग बन जाता है। इसी स्थिति को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया गया है—“सबसे बड़ा है रोग, क्या कहेंगे लोग।”
यह वाक्य केवल एक कहावत नहीं, बल्कि हमारे समाज की एक गहरी मानसिक समस्या का चित्रण है। बहुत से लोग अपने जीवन के निर्णय स्वयं नहीं लेते, बल्कि यह सोचकर पीछे हट जाते हैं कि लोग क्या कहेंगे। वे नया काम शुरू करने से डरते हैं, अपनी पसंद का विषय चुनने से डरते हैं, अपनी प्रतिभा दिखाने से डरते हैं, यहाँ तक कि कभी-कभी सही बात कहने से भी डर जाते हैं। यह डर व्यक्ति की स्वतंत्रता, आत्मविश्वास और विकास—तीनों को रोक देता है।
वास्तव में लोगों का काम ही कहना है। यदि कोई व्यक्ति अच्छा काम करता है, तब भी लोग कुछ न कुछ कहते हैं; और यदि कोई गलती करता है, तब भी लोग आलोचना करते हैं। इतिहास गवाह है कि जिन लोगों ने समाज के लिए महान कार्य किए, उन्हें भी विरोध और आलोचना का सामना करना पड़ा। महात्मा गांधी ने जब सत्य और अहिंसा का मार्ग अपनाया, तब भी बहुत से लोगों ने उनका मज़ाक उड़ाया। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने जब सामाजिक समानता की बात की, तब उन्हें भी अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। यदि वे “लोग क्या कहेंगे” सोचकर रुक जाते, तो देश और समाज का इतना बड़ा परिवर्तन संभव नहीं हो पाता।
आज के समय में भी यह समस्या बहुत अधिक दिखाई देती है। कोई विद्यार्थी यदि विज्ञान की बजाय कला विषय लेना चाहता है, तो उसे डर लगता है कि रिश्तेदार क्या कहेंगे। कोई लड़की यदि अपने सपनों के अनुसार करियर बनाना चाहती है, तो समाज के ताने सुनने पड़ते हैं। कोई युवक व्यवसाय शुरू करना चाहता है, तो लोग कहते हैं कि नौकरी छोड़ना मूर्खता है। इस प्रकार समाज की बातें व्यक्ति के मन में संदेह भर देती हैं। धीरे-धीरे वह अपने सपनों से दूर होने लगता है और दूसरों की अपेक्षाओं के अनुसार जीने लगता है।
यह भी सच है कि जो लोग स्वयं कुछ नया करने का साहस नहीं जुटा पाते, वे अक्सर दूसरों की आलोचना करने में आगे रहते हैं। किसी के कपड़ों पर टिप्पणी करना, किसी के काम पर हँसना, किसी की सफलता से जलना—ये सब समाज में सामान्य बातें बन गई हैं। ऐसे लोग स्वयं आगे नहीं बढ़ते और दूसरों को भी आगे बढ़ते नहीं देखना चाहते। यदि हम हर आलोचना को अपने दिल पर लेने लगें, तो जीवन में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाएँगे।
व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि हर किसी को खुश करना असंभव है। संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं हुआ जिसकी सभी लोगों ने प्रशंसा की हो। भगवान राम और श्रीकृष्ण जैसे आदर्श व्यक्तित्वों को भी आलोचना का सामना करना पड़ा। इसलिए यह अपेक्षा करना कि लोग हमारे हर काम की सराहना करेंगे, व्यर्थ है। हमें यह देखना चाहिए कि हमारा कार्य सही है या नहीं, उससे किसी का भला हो रहा है या नहीं, और क्या वह हमारे जीवन के उद्देश्य के अनुरूप है। यदि उत्तर “हाँ” है, तो हमें निडर होकर आगे बढ़ना चाहिए।
“क्या कहेंगे लोग” की मानसिकता का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि व्यक्ति अपनी वास्तविक क्षमता को पहचान ही नहीं पाता। वह अपने मन की इच्छाओं को दबाकर जीता है। बाहर से वह सामान्य दिखाई देता है, लेकिन भीतर से असंतुष्ट रहता है। कई लोग पूरी जिंदगी दूसरों की राय के अनुसार निर्णय लेते रहते हैं और बाद में पछताते हैं कि उन्होंने अपने सपनों को मौका ही नहीं दिया। जीवन एक बार मिलता है; यदि इसे केवल दूसरों की सोच के अनुसार जीया जाए, तो यह अपने साथ अन्याय करने जैसा है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें समाज की हर बात को अनदेखा कर देना चाहिए। समाज में रहकर कुछ मर्यादाओं और नैतिक मूल्यों का पालन करना आवश्यक है। बड़ों का सम्मान, दूसरों के अधिकारों का ध्यान और अच्छे आचरण की आवश्यकता हमेशा रहेगी। लेकिन जब बात हमारे व्यक्तित्व, शिक्षा, करियर, प्रतिभा और जीवन के सही निर्णयों की हो, तब हमें अपने विवेक का उपयोग करना चाहिए। दूसरों की सलाह सुनना अच्छी बात है, पर अंतिम निर्णय हमारा अपना होना चाहिए।
आत्मविश्वास इस रोग की सबसे अच्छी दवा है। जब व्यक्ति को अपने काम पर विश्वास होता है, तब वह आलोचनाओं से नहीं डरता। वह जानता है कि सफलता और असफलता दोनों जीवन का हिस्सा हैं। असफल होने पर लोग कुछ दिन बातें करेंगे, फिर भूल जाएँगे; लेकिन यदि व्यक्ति डरकर प्रयास ही नहीं करेगा, तो उसका पछतावा जीवनभर साथ रहेगा। इसलिए प्रयास करना हमेशा बेहतर है।
माता-पिता और शिक्षकों की भी यह जिम्मेदारी है कि वे बच्चों में आत्मविश्वास पैदा करें। उन्हें यह सिखाएँ कि गलती करना बुरा नहीं, बल्कि कोशिश न करना बुरा है। बच्चों को अपनी बात कहने, प्रश्न पूछने और अपनी रुचि के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए। जब नई पीढ़ी “लोग क्या कहेंगे” के डर से मुक्त होगी, तभी वह सृजनात्मक, साहसी और आत्मनिर्भर बन सकेगी।
अंततः यही कहा जा सकता है कि —
“सबसे बड़ा है रोग, क्या कहेंगे लोग”
केवल एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन का गहरा सत्य है। यदि हम हर समय लोगों की राय के बारे में सोचते रहेंगे, तो न हम अपने सपने पूरे कर पाएँगे, न अपनी प्रतिभा को पहचान पाएँगे और न ही सच्चा सुख प्राप्त कर पाएँगे। लोगों का काम कहना है; वे आज भी कहेंगे, कल भी कहेंगे। इसलिए हमें अपने विवेक, आत्मविश्वास और सही उद्देश्य के साथ आगे बढ़ना चाहिए। जो व्यक्ति इस डर पर विजय पा लेता है, वही वास्तव में स्वतंत्र जीवन जी पाता है और समाज में कुछ नया करने का साहस जुटा पाता है। जीवन का मूल मंत्र यही होना चाहिए।

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