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आस बूंद की – बबीता शर्मा की कलम से

 

घनघोर घटा ले अंगड़ाई श्रृंगारित मन बज रहा साज,
रत्नाकर लिए हिलोर हृदय में कर रहा शौर्य आगाज़ ।

अति भीष्ण गर्मी उबाल पर जला रही दे कर अनल ,
रोम रोम से उठती पुकार ए घटा देकर नीर सम्भाल।

दिनकर क्रोधित बना शेष कर रहा निगल सुधा शांत ,
प्रकोप गहन छाया धरा पर भस्म हो रहे सभी जीव प्रांत।

नहीं दर्शन अब होते देवदार के जो नभ को छुए ,
करे प्रार्थना शीतलता की जलधर बरसो नीर लिये ।

क्रंदन भूप करे चढ़ाई चीत्कार मच रहा चहुँ ओर ,
बूंद बूंद की आस में दम टूटे श्वासों की छूट रही डोर।

बबीता शर्मा

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