बेरोजगारी का सच,व्यवस्था से ज्यादा मानसिकता जिम्मेदार

अरविंद शर्मा। इंडिया जागरण टुडे, ब्यूरो चीफ
देश में इन दिनों जहां देखिए, वहीं महंगाई और बेरोजगारी की चर्चा सुनने को मिल जाती है। टीवी चैनलों की बहस हो, सोशल मीडिया की पोस्ट हो या चौराहों की बातचीत हर जगह यही कहा जा रहा है कि युवाओं के पास काम नहीं है, लोग बेरोजगार घूम रहे हैं और महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है।
लेकिन यदि इस पूरे विषय को जमीनी स्तर पर जाकर देखा जाए, तो तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है।
आज गांवों से लेकर शहरों तक काम करने वाले लोगों की भारी कमी देखने को मिल रही है। गांव के किसी छोटे चौराहे पर स्थित चाय की दुकान पर जाइए, शायद ही कोई मेज खाली मिले। सुबह से देर रात तक लोग चाय, पकौड़ी, ताश-भुंजा (मुर्गा-लइया) की दुकानों पर बैठे दिखाई देते हैं। कई गांवों के चौराहों पर प्रतिदिन एक से डेढ़ कुंतल तक चिकन बिक रहा है। केवल ताश-भुंजा की एक प्लेट की कीमत कम से कम 120 रुपये होती है।
यदि लोगों के पास पैसे नहीं होते और महंगाई इतनी असहनीय होती, तो क्या इतनी बड़ी मात्रा में मांस और अन्य खानपान की चीजें बिक पातीं?
बीयर और शराब की दुकानों की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है। वहां घंटों लाइन लगानी पड़ती है। छोटे कस्बों और गांवों में होटल और रेस्टोरेंट इतने भरे रहते हैं कि बिना पहले से सीट बुक कराए खाना मिलना मुश्किल हो जाता है। यदि रात आठ बजे परिवार के साथ भोजन करना हो, तो कई जगह शाम पांच बजे से ही फोन कर जगह तय करनी पड़ती है। यह दृश्य उसी समाज का है, जहां लगातार महंगाई और बेरोजगारी का रोना रोया जा रहा है।
असल स्थिति यह है कि आज मेहनत करने वाले लोगों की भारी मांग है। गांवों में राजगीर मिस्त्री की मजदूरी 700 रुपये प्रतिदिन तक पहुंच चुकी है। फिर भी यदि कोई मकान बनवाने निकले, तो मिस्त्री आसानी से उपलब्ध नहीं होते। कारपेंटर, वेल्डर, बिजली मिस्त्री और अन्य कारीगरों की भी यही स्थिति है। किसी घर की बिजली खराब हो जाए, तो मिस्त्री तुरंत आने को तैयार नहीं होता। कई बार लोगों को एक-दो दिन तक इंतजार करना पड़ता है। दस मिनट के छोटे काम के लिए भी लोग सौ-दो सौ रुपये देने को मजबूर हैं। इसके बावजूद काम करने वालों की कमी बनी हुई है।
आज लगभग हर गांव में मोटरसाइकिलों की भरमार है। कई लोग प्रतिदिन सौ-दो सौ रुपये का पेट्रोल केवल घूमने-फिरने में खर्च कर देते हैं। यदि आर्थिक स्थिति इतनी खराब होती, तो क्या यह संभव था?
सच्चाई यह है कि समाज का एक बड़ा वर्ग मेहनत वाले काम करने के बजाय आसान और जल्दी पैसा कमाने का सपना देख रहा है। कुछ लोग केवल सरकारी नौकरी को ही रोजगार मानते हैं। सुबह दस बजे नौकरी पर जाएं, शाम चार-पांच बजे लौट आएं और महीने का अच्छा वेतन मिले—ऐसी अपेक्षा हर व्यक्ति की है। लेकिन यह भी सच्चाई है कि देश के हर नागरिक को सरकारी नौकरी देना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं है।
निश्चित रूप से देश के कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जहां रोजगार के अवसर सीमित हैं और सड़क, उद्योग तथा बाजार जैसी सुविधाओं का अभाव है। वहां के लोगों की परेशानी वास्तविक है। लेकिन जहां सुविधाएं उपलब्ध हैं, वहां भी कई लोग काम करने से बचते दिखाई देते हैं। मेहनत वाले कार्यों से दूरी और आरामदायक जीवन की चाह ने समस्या को और बढ़ा दिया है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि बेरोजगारी और महंगाई पर केवल भावनात्मक बहस करने के बजाय समाज अपनी कार्य संस्कृति पर भी विचार करे। काम छोटा या बड़ा नहीं होता। जो व्यक्ति मेहनत करने को तैयार है, उसके लिए आज भी अवसरों की कमी नहीं है। लेकिन जो बिना संघर्ष के बड़ी सफलता चाहता है, उसके लिए हर व्यवस्था खराब दिखाई देती है।
देश की आर्थिक स्थिति का वास्तविक आकलन केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि समाज की कार्यशैली, खर्च करने की आदतों और मेहनत के प्रति सोच से भी किया जाना चाहिए। शायद तभी बेरोजगारी और महंगाई के असली कारणों को सही मायनों में समझा जा सकेगा।



