वो भी क्या दिन थे , बिजली गुल और छत पर मेला – प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”

यह बात उन दिनों की है जब मैं बहुत छोटी थी और गर्मियों की छुट्टियाँ पूरे साल का सबसे सुखद समय लगती थीं। उन दिनों हमारे शहर में बिजली का जाना आम बात थी। जैसे ही शाम ढलती और अचानक बत्ती गुल होती, पूरा घर “अरे, फिर चली गई!” कहकर मुस्कुरा उठता। आश्चर्य की बात यह थी कि उस अंधेरे में भी एक अलग उजाला छिपा होता था।
मुझे आज भी याद है, माँ जल्दी-जल्दी रसोई का काम समेटतीं और हम बच्चे उत्साह से छत पर बिस्तर लगाने दौड़ पड़ते। कोई दरी बिछाता, कोई तकिया लाता और कोई सुराही में ठंडा पानी भरकर रख देता। थोड़ी ही देर में आसपास की सारी छतें लोगों से भर जातीं। ऐसा लगता मानो पूरे मोहल्ले का मेला छतों पर ही लग गया हो।
हम बच्चे चाँद और तारों को निहारते हुए खेल खेलते थे। कभी अंताक्षरी होती, कभी पहेलियाँ बुझाई जातीं। दादी अपनी मीठी आवाज़ में पुराने दिनों की कहानियाँ सुनातीं— जिनमें गाँव, बैलगाड़ी, मेलों और बचपन की शरारतों की झलक होती थी। उनकी बातें सुनते-सुनते मन जैसे किसी और ही दुनिया में पहुँच जाता।
एक रात मुझे याद है, तेज गर्मी के बावजूद हल्की ठंडी हवा चल रही थी। पिता जी ने आसमान की ओर इशारा करके सप्तऋषि और ध्रुव तारा दिखाया था। उस दिन पहली बार महसूस हुआ था कि आसमान कितना विशाल और सुंदर है। बिजली की चकाचौंध में शायद वह सुंदरता कभी दिखाई ही नहीं देती।
आज सबके घरों में इन्वर्टर, ए.सी. और मोबाइल हैं, लेकिन वो अपनापन कहीं खो गया है। अब न छतों पर वैसी महफ़िलें सजती हैं, न दादी की कहानियाँ सुनाई देती हैं।
सच कहूँ, जब भी गर्मियों की रात और बिजली कटने की बात आती है, मन बरबस कह उठता है— “वो भी क्या दिन थे!”
प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”




