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तपती गर्मी मन हुआ बेहाल — डॉक्टर मीरा कनौजिया काव्यांशी

 

तपती धरती बढ़ता प्रदूषण गर्मी में मन हुआ बेहाल ऋतु चक्र परिवर्तन ,क्रमानुसार परिवर्तित हो रहा है पृथ्वी अपनी धुरी पर चलाएं मान है।
सभी रितु एक के बाद एक क्रमानुसार आती है, अपना प्रभाव दिखाती हैं और तुरंत उनके गमन हो जाता है
किंतु विशेष तौर पर बात यह है प्रत्येक ऋतु अपना नैसर्गिक स्वभाव छोड़कर के समय सीमा आगे बढ़ा लिए ,क्योंकि यह सब प्रदूषण के कारण ही हो रहा है प्रदूषण के कारण गर्मी की भीषण पड़ रही है।

कारण यह है कि मनुष्य जनसंख्या वृद्धि के कारण खेत खलिहानों को मकान का स्थान देता जा रहा है और जो पृथ्वी है उसकी हरियाली समाप्त होती जा रही है। दिन प्रतिदिन वृक्षों का हनन वन्य जीव प्राणियों का हनन जो हमारे पृथ्वी के संतुलन को बनाए रखे हैं, यही मूल कारण है मानव ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा है,और यह सब प्रगति की दौड़ में अंधाधुंध भागे जा रहे हैं ,त्वरित गति से, आने वाली पीढ़ी हमारे उनके लिए बड़ा ही अफसोस की बात है।

निवारण यह है कि हमारे प्रत्येक प्राणी को सचेत जागृत होकर कुछ करना होगा। ऐसे ऐसे कार्य जो की प्रकृति के लिए लाभदायक है। प्रकृति अपना संतुलन बनाए रखें।
वृक्षारोपण प्रत्येक प्राणी को हमेशा लगाना चाहिए, यह नहीं की कोई विशेष दिन उनके लिए बनाना है। मन से कार्य करना होगा केवल बोलने से कुछ नहीं होता ।कार्य प्रणाली में पालन करना अनिवार्य होगा।
खेत खलिहानों की रक्षा करनी होगी नदियों के पानी को बचाना होगा। कितने कल कारखाने हैं धुऐ को निकालने के लिए ऊपर चिमनिया लगानी होगी। वातावरण परिवेश को सुरक्षित को स्वच्छ रखना होगा। पर्यावरण परिवेश को सुंदर बनाना होगा। अपने घर आंगन को महकाना होगा।
जन-जन जागृति लाना ऊर्जा का संरक्षण करना होगा
प्रति व्यक्ति पेड़ लगाना। नदियों के पानी को स्वच्छ रखना होगा।
वृक्षों का ना करें हनन।
मन में विचार करें चिंतन।

डॉक्टर मीरा कनौजिया काव्यांशी

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