तालीम व तरबियत समाज की कामियाबी और तरक़्क़ी की कुंजी ज़मानत है : हम स्वयं भी अपनी ज़िम्मेदारी निभायें:
अब्दुल सलाम जौहर
अक्सर बहुत आसानी से हम अपनी बिरादरी समाज क़ौम मिल्लत की
ना- कामियाबी तरक़्क़ी और आर्थिक बदहाली की नाकामी और हमारे साथ होने वाले ज़ुल्म, ना – इंसाफ़ी की बात दोष को बहुत ही आसानी से दूसरों पर डाल देते हैं ,कभी सरकारों पर एवं प्रशासन पर, किसी संगठन संस्था को क़सूरवार ज़िम्मेरार ठहरा कर उन पर डालकर, समाज मिल्लत के लोग बड़ी आसानी से उन पर इल्ज़ाम लगाकर अन्य पर दोषारोपण कर अपने आपको बरी कर लेते हैं और यही कार्य हम करते आ रहे हैं !
क्या यही पूरी सच्चाई और हक़ीक़त है?
क्या हमने ईमानदारी फ़िक्रमंदी संजीदगी से कभी अपने आप पर स्वयं पर गौर मंथन किया कि हम क्या कर रहे हैं और हमारी क्या ज़िम्मेदारियाँ हैं और हमारी अपनी स्वयं की क्या क्या कमियाँ एवं लापरवाहियाँ ग़लतियाँ हैं?
हमारी अपनी क्या ज़िम्मेदारियाँ हैं उनका सही ईमानदारी से निर्वहन कर रहे हैं !
जो हम कर रहे हैं क्या वो सही हैं ? हमें ख़ुद को जो करना चाहिये था जो ज़िम्मेदारी हमारी अपने लिये स्वयं के घर ख़ानदान अपने समाज समुदाय बिरादरी के लिये जो करना चाहिये क्या वो हम कर रहे हैं और
उसके लिये क्या हम पूरी ईमानदारी मेहनत से गौरो – फ़िक्र, प्रयास और मेहनत जद्दो जेहद एवं निरंतर कोशिशें कर रहे हैं ?
जब हम ख़ुद ही ईमानदारी से अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा करने के लिये स्वयं ही लापरवानी कर रहे हैं और कुछ नहीं कर रहे हैं !
बल्कि हम एक दूसरे की तनक़ीद, आपस में ना इत्तिहाद है, ना आपसी भाई चारा है, ना तालीम व तरबियत शिक्षा पाने पर विशेष तवज्जो ध्यान है और अपने लोगों को उच्च आधुनिक एवं व्यवसायिक प्रोफेशनल शिक्षा पर और ना ही कारोबार करने की जद्दो जेहद कोई फ़िक्रमंदी है ना ही कोई मुस्तक़बिल का मुस्तक़िल पुख्ता प्लान ना कोई उसका हक़ीक़त में अमल ही है!
फालतू बे कार के बातों और कामों में, हम रातों को अपने मोहल्लों कॉलोनियों में, चाय की होटलों में देर रात तक बैठकर अपना क़ीमती वक़्त एवं ज़िंदगी बर्बाद कर रहे हैं !दीगर गंदे शोक नशे तक की लत आदतों में हमारे समुदाय क़ौम बिरादरी के नौजवान बच्चे अपना क़ीमती वक़्त अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर रहे हैं!
दूसरी और समाज में महँगी शादी ब्याह और उसमें दिखावा में और ग़ैर ज़रूरी रस्मों,रीति-रिवाजों में बे तहाशा फ़िज़ूल ख़र्चा एवं दिखावा में क़ौम मिल्लत समाज अपना क़ीमती सरमाया पैसा ज़ाया कर रही है ! क्या समाज में शादियाँ सामूहिक सम्मेलन में एवं सादगी से कम लेन देन और ग़ैर ज़रूरी रस्मों के ख़र्च को ख़त्म या कम करके, बिना बैंड बाजा एवं बिना जहेज़ का प्रचलन को बढ़ाया जाकर उस फ़िज़ूल रकम राशि की बचत से हम अपने क़ौम बिरादरी के बच्चों की उच्च तालीम व तर्बियत पर ख़र्च नहीं कर सकते हैं ? क्या अपनी क़ौम बिरादरी के कमज़ोर ग़रीब लोगों बच्चों के कारोबार में आर्थिक मदद कर के उनको आत्मनिर्भर नहीं बनाया जा सकता है ? यह समाज के लोगों ज़िम्मेदारों को सोचने, समझने और इस पर काम करने की ज़रूरत हैं
हम आपस में इत्तिहाद भाई चारा हमदर्दी एक दूसरे की मदद में भागीदार हिस्सेदार बनकर अपने ज़रूरत मंद क़ाबिल होनहार बच्चों की आला तालीम में मददगार मील का पत्थर बन सकते हैं !
अपनी फ़िज़ूल ग़लत ख़र्चों, आदतों बुराइयों और रातों को देर तक मोहल्लों और होटलों में बैठकर वक़्त बर्बाद करने से बच सकते हैं ताकि सुबह जल्दी उठकर शिक्षा और अपने अपने काम कारोबार की मेहनत जद्दों जेहद में लग जायें यही हमारी सबसे बड़ी समाज के प्रति हमदर्दी और ज़िम्मेदारी होगी !
मौजूदा हालात और माहौल को देखते हुए अब सोचने समझने और हर एक को गोर करने का अमल करने का वक़्त और मुक़ाम है
हमें दूसरों पर इल्ज़ाम लगाने से पहले अपने अमल कारनामों ज़िम्मेदारियों पर नज़र डालें, स्वयं सुधार करने और ख़ुद अपनी अपने घर परिवार वालों और क़ौम मिल्लत बिरादरी की ज़िम्मेदारी समझने उसे पूरा करने की अल्लाह हमें नेक तौफ़ीक़ अता फ़रमाये!
*अब्दुल सलाम जौहर*
कन्वीनर मुस्लिम प्रोग्रेसिव फ़ेडरेशन
राजस्थान
94140 58529




