(संस्मरण) साइकिल – अलका गर्ग “अक्श “ गुरुग्राम

मैं दो भाइयों की एक बहन..तो मेरे सारे शौक,सारे खेल लड़कों जैसे थे। भाइयों के दोस्त मेरे दोस्त थे। मम्मी अक्सर कहतीं कि किसी लड़की को भी दोस्त बना कर लड़कियों वाले खेल भी खेल लिया कर…पर मैं ध्यान ही नहीं देती थी।
दोनों भाई साइकिल चलाना सीख गए थे बस मैं ही नहीं सीख पाई थी।मुझे उतरने में बहुत डर लगता था। कई बार गिर चुकी थी इसलिए चढ़ना भी नहीं चाहती थी परंतु भाइयों को साइकिल चलाते देख मन बहुत मचलता था।
एक दिन भाई और उसके दोस्तों ने मुझे साइकिल पर चढ़ा दिया और पीछे से पकड़ कर कुछ दूर साथ साथ दौड़ते रहे और जब देखा कि मैं आराम से चला रही हूँ तो साइकिल छोड़ कर खेल कूद में लग गए।
मैं बड़े आनंद से हवा से बातें कर रही थी कि मेरी नज़र खेलते हुए भाई और उसके दोस्तों पर पड़ी…
अरे फिर मुझे किसने पकड़ा हुआ है देखने के लिए पीछे मुड़ी और डर के मारे धड़ाम…
अगले दिन सबने खूब उकसाया कि अब तो तुमको चलाना आ गया कल हमने देखा कि कई चक्कर लगाए तुमने मैदान के। फिर तो रोज सब मिल कर मुझे चढ़ा देते और खेलने में लग जाते और मैं मजे से मन भर चलाती। जब मुझे उतरना होता तो आवाज़ें देती तो बड़ा एहसान जताते हुए आ कर उतारते।
हर दिन की तरह एक दिन मुझे साइकिल पर चढ़ा कर वे सभी पिट्ठू खेलने लगे।बॉल झाड़ियों में चली गई तो उसको ढूँढने के चक्कर में सभी मुझे भूल कर बहुत दूर निकल गए। अब मैं परेशान..आवाज़ दे दे कर और चक्कर लगा लगा कर थक गई। अब क्या करूँ…उतरने से तो डर लग रहा था कि जरूर गिरूँगी।पर क्या करती साइकिल को मैदान के चारों तरफ़ लगी सुंदर कटी हुई मेंहदी की हेज के पास ले गई और साइकिल सहित उसमें कूद गई।
ताज़ा कटे हुए पेड़ों से हाथ पाँव में कई खरोचें आईं पर मैं आख़िरकार साइकिल से तो उतर ही गई।
मेरी याद आने पर सब दौड़ते हुए वहाँ पहुँचे। तब तक तो घर में पापा मेरी खरोंचें डेटोल से धो रहे थे और घर आने पर तो भाइयों का और दोस्तों का क्या हाल हुआ आप तो बस कल्पना ही कीजिए।
एक राज की बात बताऊँ…अभी तक भी मैं साइकिल पर किसी तरह से घिसट कर दौड़ कर चढ़ तो जाती हूँ…खूब चला भी लेती हूँ पर उतरना… अभी तक नहीं आया…अभी भी किसी सहारे से या गिर कर ही उतरती हूँ।
अलका गर्ग “अक्श “
गुरुग्राम




