प्रतिभावान स्त्री की मनोव्यथा और स्त्री-विरोधी मानसिकता— डॉ. अनामिका दूबे “निधि”
जब एक स्त्री अपनी पहचान बनाती है, तो सबसे पहले सवाल उसकी प्रतिभा पर नहीं, उसके चरित्र पर क्यों उठते हैं?
एक पढ़ी-लिखी स्त्री जब घर की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए बच्चों का पालन-पोषण करती है, नौकरी करती है, अपने सपनों को सींचती है और समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाती है, तो यह केवल उसकी व्यक्तिगत सफलता नहीं होती—यह उसके संघर्ष, अनुशासन, धैर्य और आत्मविश्वास की कहानी होती है।
लेकिन विडंबना देखिए…
जिस समाज को ऐसी स्त्री पर गर्व होना चाहिए, उसी समाज में कुछ संकीर्ण मानसिकता वाले लोग उसकी उपलब्धियों को स्वीकार करने के बजाय उसके चरित्र पर उँगली उठाना आसान समझते हैं।
उसकी मेहनत दिखाई नहीं देती,
उसकी रातों की जाग दिखाई नहीं देती,
उसके त्याग दिखाई नहीं देते,उसके संघर्ष दिखाई नहीं देते…
दिखाई देता है तो केवल इतना कि—
“यह स्त्री इतनी आगे कैसे बढ़ गई?”
और जब इस प्रश्न का उत्तर उसकी मेहनत में नहीं मिलता, तो कुछ लोग उसके चरित्र में उत्तर तलाशने लगते हैं।
स्त्री की सफलता से इतनी परेशानी क्यों?
एक स्त्री अगर घर तक सीमित रहे तो कहा जाता है कि उसमें महत्वाकांक्षा नहीं।
वह नौकरी करे तो कहा जाता है कि घर पर ध्यान नहीं देती।
वह अपने बच्चों को संभाले तो कहा जाता है कि उसकी दुनिया छोटी है।
वह साहित्य, कला, शिक्षा या समाजसेवा में नाम कमाए तो कहा जाता है—
“इसके पास इतना समय कैसे है?”
और जब वह इन सबके साथ मुस्कुराते हुए आगे बढ़ती रहती है, तो कुछ लोगों के पास उसके विरुद्ध केवल एक हथियार बचता है—अफवाह….क्योंकि प्रतिभा का उत्तर प्रतिभा से देना कठिन है।
मेहनत का उत्तर मेहनत से देना कठिन है।
उपलब्धि का उत्तर उपलब्धि से देना कठिन है।इसलिए चरित्र पर सवाल उठाना आसान लगता है।चरित्र पर वार—सबसे आसान हथियार किसी स्त्री को कमजोर करना हो तो उसके काम पर प्रश्न मत उठाइए, उसके चरित्र पर प्रश्न उठा दीजिए।
समाज का एक वर्ग बिना प्रमाण के कही गई बात को भी सच मानने के लिए तैयार हो जाता है।
“सुना है…”
“लोग कहते हैं…”
“उसके बारे में तो बहुत कुछ सुनने में आता है…”
ये तीन छोटे-छोटे वाक्य कई बार किसी स्त्री की वर्षों की मेहनत पर कालिख पोतने की कोशिश करते हैं।
लेकिन जो लोग अफवाह फैलाते हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि—
किसी के बारे में झूठ बोलने से उसका चरित्र छोटा नहीं होता, बल्कि झूठ बोलने वाले की मानसिकता सामने आती है।
चरित्र प्रमाणपत्र दूसरों की जुबान से नहीं मिलता।चरित्र वर्षों के आचरण से निर्मित होता है।
प्रतिभावान स्त्री की असली पीड़ा
बाहर से मजबूत दिखाई देने वाली स्त्री भी भीतर से इंसान ही होती है।वह भी आहत होती है। वह भी सोचती है—
“आखिर मैंने किसका क्या बिगाड़ा है?”
वह भी कभी अकेले में उन शब्दों को याद करके दुखी होती है, जिन्हें उसने सामने मुस्कुराकर अनसुना कर दिया था।
कभी-कभी उसे अपने ही लोगों के बीच सफाई देने का मन करता है,लेकिन फिर वह रुक जाती है।क्योंकि उसे समझ आता है कि—जिसे सच जानना ही नहीं है, उसे सफाई भी समझ नहीं आएगी।यही वह क्षण होता है जब एक संवेदनशील स्त्री भीतर से थोड़ा और मजबूत होती है।
वह सीखती है कि हर आरोप का उत्तर देना आवश्यक नहीं,हर अफवाह का खंडन करना आवश्यक नहीं।हर व्यक्ति को अपनी सच्चाई समझाना आवश्यक नहीं,क्योंकि जीवन बहुत छोटा है और लक्ष्य बहुत बड़े।
कुछ स्त्रियाँ दूसरी स्त्री की सफलता से क्यों जलती हैं?
यहाँ एक बात स्पष्ट करना आवश्यक है—हर स्त्री ऐसी नहीं होती।
असंख्य महिलाएँ दूसरी महिलाओं की सफलता पर गर्व करती हैं, उन्हें आगे बढ़ाती हैं और उनके संघर्ष में साथ खड़ी होती हैं,समस्या स्त्री होने में नहीं है,समस्या संकीर्ण सोच में है,कुछ लोग दूसरे की उपलब्धि को अपनी हार समझ लेते हैं।
उन्हें लगता है कि यदि सामने वाली स्त्री सम्मान पा रही है, तो उनका महत्व कम हो रहा है। यदि कोई महिला सुंदर लिखती है, अच्छा बोलती है, मंच पर सम्मान पाती है, नौकरी में आगे बढ़ती है या समाज में पहचान बनाती है, तो उसकी प्रशंसा करने के बजाय उसके बारे में बातें बनाना उन्हें आसान लगता है।यह प्रतिस्पर्धा नहीं है।
यह भीतर की असुरक्षा है।
क्योंकि स्वस्थ प्रतियोगिता कहती है—
“वह आगे बढ़ी है, मैं भी मेहनत करूँगी।”
लेकिन संकीर्ण मानसिकता कहती है—
“मैं आगे नहीं बढ़ सकती तो उसे नीचे खींच देती हूँ।”
दूसरी स्त्री को गिराकर कोई ऊँचा नहीं होता किसी की प्रतिष्ठा पर चोट करके अपनी प्रतिष्ठा नहीं बनती।
किसी की छवि बिगाड़कर अपनी छवि उजली नहीं होती।
किसी के विरुद्ध अफवाह फैलाकर अपनी प्रतिभा सिद्ध नहीं की जा सकती।
और सबसे महत्वपूर्ण—
दूसरी स्त्री के चरित्र पर कीचड़ उछालने से किसी का अपना चरित्र उजला नहीं हो जाता।
यदि किसी महिला से शिकायत है तो सामने बात कीजिए।
यदि उसके काम में कमी दिखाई देती है तो तथ्य रखिए।
यदि उससे असहमति है तो तर्क कीजिए।
लेकिन बिना प्रमाण किसी स्त्री के चरित्र को निशाना बनाना केवल इसलिए कि वह आपसे आगे बढ़ रही है—यह न तो साहस है और न ही श्रेष्ठता।
एक स्त्री की उपलब्धि के पीछे कितनी स्त्रियाँ होती हैं, कभी सोचिए
एक कामकाजी माँ जब सुबह उठकर घर संभालती है, बच्चों की चिंता करती है, नौकरी करती है और फिर अपने सपनों के लिए समय निकालती है, तो उसके पीछे अनगिनत त्याग होते हैं।
कई बार वह अपने आराम का समय छोड़ती है।
कई बार अपनी इच्छाएँ टालती है।
कई बार थककर भी मुस्कुराती है।
और फिर जब उसे कोई सम्मान मिलता है, कोई उपलब्धि हासिल होती है या समाज में पहचान मिलती है, तो उसके संघर्ष को देखने के बजाय उसके चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगा देना कितना दुर्भाग्यपूर्ण है।
एक स्त्री को दूसरी स्त्री का संघर्ष समझना चाहिए।
उसे उसकी राह में काँटे नहीं, हौसला देना चाहिए।
क्योंकि स्त्री की असली शक्ति दूसरी स्त्री को गिराने में नहीं, उसे उठाने में है।
प्रतिभा को बदनाम करके समाप्त नहीं किया जा सकता
अफवाहें कुछ समय के लिए शोर पैदा कर सकती हैं।
लेकिन प्रतिभा का प्रकाश शोर से बुझता नहीं।
जिसने वर्षों पढ़ा है, सीखा है, लिखा है, काम किया है और अपनी पहचान बनाई है, उसकी पहचान कुछ लोगों की बातों पर निर्भर नहीं करती।
आज कोई उसके बारे में बात करेगा।
कल कोई दूसरा किसी और के बारे में।
लेकिन इतिहास हमेशा यह देखता है कि व्यक्ति ने क्या किया, न कि लोगों ने उसके बारे में क्या कहा।
इसलिए प्रतिभावान स्त्री को हर आवाज़ का जवाब देने की आवश्यकता नहीं।
कभी-कभी उसकी सबसे खूबसूरत प्रतिक्रिया होती है—
अपने काम को और बेहतर करते जाना।
मौन कमजोरी नहीं होता
कुछ लोग समझते हैं कि यदि कोई स्त्री उनके आरोपों का उत्तर नहीं दे रही, तो शायद उनके पास कहने को कुछ है।
नहीं।
कई बार मौन इसलिए होता है क्योंकि सामने वाला व्यक्ति जवाब के योग्य नहीं, बल्कि दूरी के योग्य होता है।
एक समझदार स्त्री जानती है कि हर युद्ध लड़ना आवश्यक नहीं।
कुछ लड़ाइयाँ जीतकर नहीं, छोड़कर जीती जाती हैं।
वह अपनी ऊर्जा उन लोगों पर खर्च नहीं करती जो उसे समझना ही नहीं चाहते।
वह अपने बच्चों को समय देती है।
अपने काम को समय देती है।
अपने सपनों को समय देती है।
और धीरे-धीरे समझ जाती है—
मेरी पहचान मेरे बारे में कही गई बातों से नहीं, मेरे द्वारा किए गए कर्मों से बनेगी।
और उन लोगों के लिए…
जो किसी प्रतिभावान स्त्री की उड़ान देखकर परेशान होते हैं—
उसके पंख काटने की कोशिश मत कीजिए।
क्योंकि पंख काट देने से आसमान छोटा नहीं हो जाता।
उसके रास्ते में अफवाहें मत बिछाइए।
क्योंकि सत्य को देर लग सकती है, पर वह अपना रास्ता बना लेता है।
उसके चरित्र पर प्रश्न मत उठाइए।
क्योंकि किसी महिला की गरिमा आपके शब्दों की मोहताज नहीं है।
और अगर उसकी सफलता आपको बेचैन करती है, तो शायद समस्या उसकी सफलता में नहीं, आपकी सोच में है।
अपने भीतर झाँकिए।
शायद वहाँ किसी और के प्रति ईर्ष्या नहीं, बल्कि स्वयं से असंतोष छिपा हुआ हो।
अंततः…
एक स्त्री को महान बनने के लिए किसी दूसरी स्त्री को छोटा करने की आवश्यकता नहीं।
एक महिला की सुंदरता दूसरी महिला की सुंदरता को कम नहीं करती।
एक महिला की प्रतिभा दूसरी महिला की प्रतिभा को समाप्त नहीं करती।
एक महिला की सफलता दूसरी महिला की असफलता नहीं है।
हम सबके लिए आसमान एक ही है।
इसलिए यदि कोई स्त्री घर संभालते हुए नौकरी कर रही है, बच्चों को सँवारते हुए अपने सपनों को आकार दे रही है और अपनी अलग पहचान बना रही है, तो उसकी राह में अफवाहें नहीं—सम्मान के शब्द रखिए।
क्योंकि वह केवल अपने लिए नहीं लड़ रही होती।
वह आने वाली पीढ़ियों की उन बेटियों के लिए भी रास्ता बना रही होती है, जो एक दिन यह कह सकेंगी—
“मैं स्त्री हूँ, इसलिए मेरी दुनिया छोटी नहीं होगी।
मेरे सपनों की कोई सीमा नहीं होगी।
और मेरी पहचान किसी की स्वीकृति की मोहताज नहीं होगी।”
और शायद यही किसी प्रतिभावान स्त्री की सबसे बड़ी जीत है—
वह दूसरों को पीछे छोड़कर नहीं,
अपने कल से आगे निकलकर बड़ी होती है।
— डॉ. अनामिका दूबे “निधि”




