पत्रकारिता दिवस – विनोद कुमार शर्मा

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ में पत्रकारिता का अहम योगदान है लेकिन जब इलेक्ट्रॉनिक प्रिंट मीडिया हो या बड़े न्यूज चैनलों पेपरों में कॉर्पोरेट हाउसों का सीधा दखल तो प्रेस की आजादी पर सवाल उठते ही हैं ।
समय समय पर सत्ता द्वारा उन्हें विदेश यात्राओं जैसे लाभ और घोषित अघोषित तोहफे प्रदान किए जाते
देश में कुछ नामचीन पत्रकार पश्चिमी या कमनिस्ट विचार धारा के प्रबल समर्थक हैं जिनको बड़े मीडिया हाऊसों से सत्ता के दबाव या डर से निकाल दिया जाता भले उन्हें मैग्सेसे अवॉर्ड मिला हो तब वह गुमनामी में यू ट्यूबर्स बन अपना काम चलाते देखे जा सकते हैं ।
सवाल फिर वही प्रेस की आजादी न तो सत्ता के साथ गलबहियों में सुरक्षित न देश की साख विदेशी इशारों पर बदनाम करने में सुरक्षित है निर्भीक और सत्य का आईना दिखना प्रेस का कर्तव्य होना चाहिए जिसे कॉर्पोरेट जगत ने अपनी मुट्ठी में बंद कर रखा जो सिर्फ वही दिखाते जो सत्ता और कारोबार का गठबंधन देखना चाहते जाति पांति में बंटा देश कैसे विश्व की अगुआई करेगा उसके लिए देश को अर्थव्यवस्था बाजार बढ़ानी होगी जो आज तो ताइवान से भी नीचे खिसक चुकी है
लेखनी जब सशक्त और सत्य के साथ चलती तो यथार्थ सामने आता सिर्फ हिन्दू मुस्लिम से चुनाव जीते जा सकते रुपए का गिरता हश्र तो चिंता का विषय जिसको ऊपर लाने जीडीपी और मजबूत अर्थव्यवस्था ठोस राजनैतिक निर्णय से होगा न की पीडीएस लाभार्थियों की संख्या बढ़ने से सोचने का विषय तो है।
विनोद कुमार शर्मा




