दादी नानी की कहानियाँ — रमेश शर्मा

आज से चालीस साल पहले न इतना सशक्त 💿 था, ना मोबाइल होते थे। पूरी कालोनी में एक या दो व्यक्तियों के टेलीफोन होता था। उसीतरह एक या दो व्यक्तियों के यहाँ टीवी होता था। जिस पर शाम को तीन घंटे दूरदर्शन के समाचार और कार्यक्रम आते थे। इतवार को शाम को टीवी पर पुरानी पिक्चर आती थी। सब आस पड़ोस के बच्चे टीवी देखने की जुगाड़ में रहते थे।
बच्चों को पढ़ाई का इतना प्रेशर नहीं होता था सर्दियों में शाम को जल्दी खाना खाकर रजाई में दादी नानी के पास सब बच्चे जाकर बैठ जाते थे और उनसे रोज नई नई कहानियों को सुनाने की फरमाइश करते थे। उनके पास राजा, रानी , राक्षस, परियों की कहानियों का पिटारा होता था। सभी बड़े ध्यान से कहानी सुनते थे और कई बार सुनते सुनते वही सो जाते थे। माँ बाद में ले जाकर अपने पास सुला लेती थी। सभी कहानियाँ प्रेरणा दायक और रोचक होती थी।
कहानी के बाद भी नानी दादी से प्रश्न उत्तर का सिलसिला चलता रहता था। कई बार अपनी पसंद की कहानी भी सुनते थे।
कहानियाँ सुनते सुनते हमें याद हो जाती थी।
बहुत ही सुंदर और शांत जीवन निकलता था। भौतिक साधनों के अभाव के बावजूद बहुत मजे से जीवन एक दूसरे के सहयोग से प्रेम पूर्वक चलता था।
आज सोचता हूँ भौतिकता और पैसे की आपाधापी ने बच्चों से उनका बचपन, बुजुर्गों से सयुंक्त परिवार में रहने का आनंद और युवा वर्ग से शान्ति को छीन लिया है। सब कुछ पास होकर भी ऐसा लगता है कि जीवन में कुछ कमी है। हर व्यक्ति परेशान है।
रमेश शर्मा




