दीपक और दर्पण – कविता साव पश्चिम बंगाल

एक नगर में एक प्रसिद्ध दर्पण था। लोग दूर-दूर से उसे देखने आते थे। कहा जाता था कि वह दर्पण व्यक्ति का चेहरा ही नहीं, उसका अहंकार भी दिखा देता है।
उसी नगर में एक छोटा-सा दीपक भी था, जो हर रात मंदिर के कोने में जलता था। न उसे कोई देखने आता, न उसकी कोई चर्चा होती। फिर भी वह चुपचाप अपना काम करता रहता।
एक दिन दर्पण ने दीपक से कहा, “तुम्हारा जीवन भी कोई जीवन है? न कोई तुम्हारी प्रशंसा करता है, न तुम्हें देखने कोई आता है। देखो मुझे, लोग मेरी एक झलक पाने के लिए उत्सुक रहते हैं।”
दीपक मुस्कुराया और बोला, “हो सकता है, पर मेरा काम दिखना नहीं, रास्ता दिखाना है।”
दर्पण को यह बात अच्छी नहीं लगी।
कुछ दिनों बाद नगर में भयंकर तूफान आया। बिजली चली गई और चारों ओर घना अंधकार छा गया। लोग घबराने लगे। उस समय दर्पण स्वयं कुछ नहीं कर पाया, क्योंकि अंधेरे में वह किसी को कुछ दिखा ही नहीं सकता था।
तब मंदिर के उसी छोटे-से दीपक को जलाया गया। उसकी लौ छोटी थी, पर उसने आसपास का अंधेरा मिटाना शुरू कर दिया। लोग उसी के सहारे मंदिर तक पहुँचे, बच्चों को घरों तक पहुँचाया गया और कई लोगों को रास्ता मिल गया।
अगली सुबह दर्पण ने झुककर दीपक से कहा, “आज समझ आया कि चमकने और प्रकाश देने में बहुत अंतर होता है। मैं केवल तब तक उपयोगी हूँ, जब तक उजाला हो। पर तुम स्वयं उजाला बन जाते हो।”
दीपक ने शांत स्वर में कहा, “जीवन का मूल्य इस बात से नहीं होता कि कितने लोग हमें देखते हैं, बल्कि इस बात से होता है कि हमारी वजह से कितने लोगों को राह मिलती है।”
संदेश : दुनिया में प्रसिद्धि से अधिक महत्वपूर्ण उपयोगिता है। जो स्वयं से अधिक दूसरों के जीवन में प्रकाश भरता है, वही वास्तव में महान कहलाता है।
कविता साव
पश्चिम बंगाल




