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पर्यावरण सुरक्षा – डॉ मीरा कनौजिया काव्यांशी

उलट पलट कर रख दी रे! मानव तूने सारी धरती ।
पुष्पित ,पल्लवित होने के लिए धरती मां तरसी।
खेत खलिहानों को मानव, तूने यह क्या कर डाला।
धरती मां के सुंदर रूप को, तहस-नहस कर डाला।
प्रकृति के हरे भरे चमन का, तूने कर दिया सर्वनाश।
तो उन्नति की होड़ में, अपना खुद कर रहा विनाश।
पेड़ों को काट-काटकर, स्वार्थ हेतु तूने किया हनन।
तनिक भी मन में नहीं किया तूने विचारमनन चिंतन।
इन्हीं कारणोसे आते हैं, प्रकृति में भयप्रद भूस्खलन।
प्रकृति में आती आपदाएं, आते भयावह भूप्रकपन ।
तूने दिया खुद ब खुद, प्रदूषण को बेवजह आमंत्रण।
नहीं सुधरा तो संभव है, प्रकृति को करना नियंत्रण।
पुष्पित पल्लवित, प्रफुल्लित हरीतिमायुक्त रत्नगर्भा।
मिटा दिए सुंदर बेल बूटे ,शुष्क , कर दी तूने वसुंधरा।
हरे भरे पेड़ लगा कर,कर दे धरती का तू नया सिंगार।
स्वय जगा प्रत्येक मानव को,तभी स्वप्न होगा साकार।

डॉ मीरा कनौजिया काव्यांशी

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