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संघर्ष के दिनों की यादें — भूमिका शर्मा शिक्षिका और लेखिका ग्वालियर (मध्यप्रदेश)

 

मन मेरी सोच, उम्मीद की राह पकड़कर,उम्मीद करुँ किसी से और सोचा कि वह मेरी हकीकत की राह को आसान बनायेगा।नहीं समझ में आया आसान नहीं संघर्ष है साथ मेरे।
पर जीवन में आशा तो बहुत रखते है,पर हर उम्मीद जरुरी तो नहीँ कोई पूरा ही करे।वही संघर्ष है कि हम सोचते हम खड़े है किसी से उम्मीद लगाए बैठे है।
हम सोचे उम्मीद रखकर हम आशावादी बन जाएंगे। पर जीवन में शूल की डगर भी तो है। किसी पर उम्मीद करके हम हमेशा ही पार कर जाये यह संभव नहीं है।वो संघर्ष में हमें ही चलना है और आगे बढ़कर जाना है।
अधिक उम्मीद करने से हर चीज नहीं मिलती।जीवन में हर पथ पर राह आसान ही हो यह भी संभव नहीं है।अधिक उम्मीद आक्रोश ला सकती है,हर राह पर हर कुछ नहीं होता।कुछ ना कुछ तो ऐसा होता है छूट जाता है।
इस मझधार में हम सोचे कहाँ है उम्मीद और किसका इन्तजार जो हमारी उम्मीद के ख्वाब को हकीकत में बदले।
समय किसके पास है जो सुने आपकी।इस जिंदगी का सफर की मंजिल में हर एक साथ नहीं देता।छूट जाता बहुत कुछ हमारे।छोड़कर चले जाते वह सहारे हमारे।हर एक का प्यार का वह सुकून का कंधा तो नहीं है।सब अपने है यह संभव नहीं।
समय नहीं है परछाई। हर आहट की परछाई अपनी नहीं।हर इन्तजार की राह आसान नहीं।हर राह मंजिल नहीं।इन्तजार पवित्र प्रेम का नाम है किसी आवाज सुनना।
वो इन्तजार आंखों के अश्रुजल का आज तक है।वो संघर्ष वह एक राह एक दिन तय किया हुआ सफर के दिन …

-भूमिका शर्मा
शिक्षिका और लेखिका
ग्वालियर (मध्यप्रदेश)

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