स्मृति में जीवित लोग – डॉ संजीदा खानम शाहीन

कुछ लोग देह छोड़कर भी नहीं जाते। वे स्मृतियों में इस तरह बस जाते हैं कि हर साँस के साथ महसूस होते हैं। शरीर नश्वर है पर रिश्तों की खुशबू, कही हुई बातें और साथ बिताए लम्हे अमर हो जाते हैं।
मृत्यु एक पड़ाव है, अंत नहीं। जो लोग हमारे जीवन को छूकर गए, वे हमारी आदतों में जिंदा रहते हैं। दादी की कहानियों का लहजा हमारी जुबान में उतर आता है। पिता की सीखें हमारे फैसलों में बोलती हैं। दोस्त की हँसी किसी अनजान मोड़ पर अचानक सुनाई दे जाती है। हम उनके बिना अधूरे लगते हैं पर असल में वे हमारे भीतर पूरे हो जाते हैं।
स्मृति एक ऐसा दर्पण है जो जाने वालों को रोज़ सामने ला खड़ा करता है। पुरानी तस्वीरों के कोने मुड़ जाते हैं, आवाज़ धुंधली पड़ जाती है, पर उनका असर धुंधला नहीं होता। वे हमें कमजोर वक्त में ताकत देते हैं। जब हम गिरते हैं तो लगता है किसी ने पीछे से थाम लिया। जब हम जीतते हैं तो लगता है किसी ने दूर से ताली बजाई।
कहते हैं समय सब भुला देता है। पर कुछ लोग समय को भी हरा देते हैं। उनका जाना सिर्फ शरीर का जाना होता है। वे विचार बनकर, संस्कार बनकर, प्रेरणा बनकर हमारे साथ चलते हैं। हम उनके अधूरे सपने पूरे करते हैं तो वे फिर से जी उठते हैं।
इसलिए मौत का शोक मनाने से बेहतर है उनके जीवन का उत्सव मनाना। उनकी बातों को जीना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि है। जब तक हम हैं, वे हैं। स्मृति में जीवित लोग कभी मरते नहीं। वे हर उस काम में मौजूद रहते हैं जो हम उनके दिए हुए प्यार और उसूलों से करते हैं।
डॉ संजीदा खानम शाहीन




