गुलमोहर – शिखा खुराना ‘कुमुदिनी’

उस दिन फरवरी की हल्की ठंड थी। कॉलेज की पुरानी लाइब्रेरी हमेशा की तरह शांत थी, बस पन्ने पलटने की धीमी आवाज़ें और खिड़की से आती हवा परदों को छू रही थी। राखी अपनी पसंदीदा जगह पर बैठी थी, खिड़की के पास वाली मेज़, जहाँ से गुलमोहर के पेड़ दिखाई देते थे। सामने खुली किताब थी, मगर आँखें बार-बार दरवाज़े की ओर उठ जाती थीं।क्योंकि आज पहली बार “प्रोफेसर अमित” लाइब्रेरी आने वाले थे।पूरा कॉलेज उनकी व्यक्तित्व की चर्चा करता था। कोई उनकी बुद्धिमत्ता का दीवाना था, तो कोई उनके सख्त मगर शालीन व्यवहार का। लेकिन राखी, उसे तो जाने क्यों उनकी आवाज़ तक सुनकर दिल धड़कने लगता था। तभी लाइब्रेरी का दरवाज़ा खुला। राखी ने अनायास नज़र उठाई और जैसे समय ठहर गया। लंबा कद, गोरा चेहरा, सुदृढ़ माथा, गहरी आँखें और बड़ी-बड़ी मूँछें। हाथ में कुछ किताबें थीं और चाल में अजीब-सा आत्मविश्वास। वे सीधे चलते हुए उसी मेज़ तक आए जहाँ राखी बैठी थी। फिर बिना कुछ कहे सामने वाली कुर्सी खींचकर बैठ गए। राखी का गला सूख गया। उसे लगा जैसे उसके कानों में किसी ने ढेर सारे घुँघरू बाँध दिए हों। दिल की धड़कन इतनी तेज़ थी कि डर था कहीं पूरी लाइब्रेरी न सुन ले।
अमित ने किताब खोली, फिर हल्की मुस्कान के साथ उसकी ओर देखा।
“आप अक्सर यहाँ बैठती हैं न?”
बस इतना-सा सवाल और राखी की दुनिया बदल गई।
उसने घबराकर किताब बंद कर दी। “जी हाँ”
“मैंने कई बार देखा है आपको,” अमित ने सहज स्वर में कहा, “बाकी लोग यहाँ सिर्फ़ परीक्षा के दिनों में आते हैं, मगर आप सच में किताबों से दोस्ती करती लगती हैं।”
राखी ने पहली बार उनकी आँखों में सीधे देखा। उन आँखों में एक अजीब-सी गर्माहट थी, कोई अहंकार नहीं, सिर्फ़ अपनापन।
“और आप?” उसने धीरे से पूछा।
अमित मुस्कराए। “मैं लोगों को पढ़ने आता हूँ, किताबें तो बहाना हैं।” राखी अनायास हँस पड़ी। उसकी हँसी इतनी धीमी थी कि जैसे किसी बंद कमरे में पहली बार कोई खिड़की खुली हो।
बाहर हवा थोड़ी और ठंडी हो गई थी। गुलमोहर के कुछ फूल उड़कर खिड़की से भीतर आ गिरे। अमित ने उनमें से एक फूल उठाया और किताब के पन्नों में रखते हुए बोले,
“कुछ मुलाक़ातें भी किताबों में रखे फूलों जैसी होती हैं, बरसों बाद भी सूखती नहीं।”
उस पल राखी को नहीं पता था कि यह मुलाक़ात उसकी पूरी ज़िंदगी की सबसे खूबसूरत याद बन जाएगी।
और आज बरसों बाद आईने के सामने खड़ी राखी को वही पहली मुलाक़ात फिर से गुलमोहर की खुशबू की तरह महसूस हो रही थी।
शिखा खुराना ‘कुमुदिनी’




