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डिजिटल युग में रिश्तों की बदलती तस्वीर – मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’

संवाद
पात्र:-
पति,पत्नी
बेटा–अमन और रजत

रसोई में बर्तन समेटते हुए…
पत्नी:-आज की परिस्थितियों को ध्यान में रखे चिंताग्रस्त होते हुए अपने पति के पास आकर कहती है।
सुन रहे हो? हमारे बेटे रोज़ हमसे थोड़ा और दूर होते जा रहे हैं।
पति– रिमोड से टीवी की आवाज धीरे करते हुए कहते हैं,” तुम ज़्यादा सोच रही हो। बच्चों के पास आजकल टाइम ही कहाँ होता है?

पत्नी: टाइम नहीं… या हमारी तरफ़ ध्यान नहीं?

पति–देखो , आफिस के बाद उनके पास अपने भी काम होते हैं।
पत्नी–क्या काम अपने पास नहीं होते हैं?
लेकिन आफिस के बाद… स्क्रीन, गेम, चैट…
घर के लोगों से दो बातें तक नहीं करते।

पति: (गहरी साँस लेकर) सही कह रही हो… ये चिंता की बात है। लेकिन वो भी क्या करे?
आजकल —सब काम फोन और लैपटॉप पर ही होता है। क्या तुझे नहीं लगता है?
वो भी कहीं अंदर ही अंदर परेशान होते होंगे।

पत्नी: हाँ! पर अगर हम अभी कुछ नहीं बोले
तो ये अपनी दुनिया में और खो जाएँगे…
हमसे दूर… अपने ही रिश्तों में पराये जैसे।

तभी फोन की घंटी बजी… ग्रुप काल था, दोनों बेटों का
उधर से (अमन ने हैलो कहा)… फिर दोनों ने प्रणाम करते हुए हालचाल पूछा। तभी रजत बोल पड़ा)
माँ ! आज इतनी उदास क्यों लग रही हो?
तबीयत ठीक नहीं क्या?
तभी (पतिदेव–बोल पड़े) अरे तुम्हारी मांँ को लग रहा है तुम लोग उससे दूर हो रहे हो । रोज बात नहीं करते इसलिए।

बेटा: (संकोच से) माँ…पापा…ऐसी बात नहीं है। बदलते समय के साथ कुछ बदलाव तो होते ही हैं। हम डिजिटल दुनिया से इसलिए ज्यादा जुड़े हैं कि सब काम हमारे इसी में होते हैं।

थोड़ी ग़लती है हमारी… हमें रोज बात करनी चाहिए। आगे से ध्यान रखेंगे।
मम्मी! आपका टाइम भी तो लगभग इसी में जाता है। उस वक्त सब हँस* पड़े।
(रजत) आप दोनों परेशान न हो मैं जल्द ही घर आता हूँ*।

पति- नहीं बेटा! परेशान नहीं हैं…तुम दोनों खुश रहो यही हमारी तमन्ना है।
बस सोशल मीडिया ने आदतें थोड़ी-सी बिगाड़ दी हैं सबकी
तुम लोग अपने शरीर का भी ध्यान रखना।
मांँ बोली! वो कहावत सुनी है ना…स्वस्थ शरीर ही जीवन का सच्चा सुख होता है।
हम समझते हैं…पढ़ाई भी ऑनलाइन, काम भी ऑनलाइन…लेकिन रिश्तों की गर्माहट, स्क्रीन से नहीं आती

अमन (धीरे से बोला) मुझे भी लगता है थोड़ी दूरियाँ महसूस होने लगी हैं। इन्हें नजदिकियों में बदलना होगा।

पत्नी, (मुस्कुराते हुए) बस इतना किया करो,
रोज़ थोड़ी देर हमारे साथ बातें कर लिया करो।
हम तुम्हारी उड़ान को रोकना नहीं चाहते… बस तुम लोगों को खोने से डरते हैं।

अरे माँ! तुम उदास मत हो मैं कल ही घर आता हूंँ।
अच्छा अब फोन रखते हैं।
बच्चों की बातें सुनकर भावुक होती माँ अनेक दुआएं देती हुई सो जाती है।
दूसरे दिन सुबह उठने से पहले ही दरवाज़े की बैल बजी दरवाज़ा खोला तो (रजत) सामने खड़ा था।
मांँ को गले लगा लिया और बोला, देख मैं आ गया।
“आप दोनों उदास मत रहा करो। हम आपके सपनों को पूरा करने के लिए ही आपसे दूर रहते हैं। मांँ को कुर्सी पर बैठाकर…गोद में सिर रखते हुए बोला।
मांँ! अच्छा हमें भी नहीं लगता, आपसे दूर रहकर… हर त्योहार पर याद आपकी याद आती है। कभी थककर चूर हो जाते हैं तो आपकी गोद में सिर रखकर सोने का मन करता है। आपका वो सिर को सहलाना याद आता है।
आपके हाथ का खाना,,बिना कहे आपका वो समझ जाना याद आता है। ये कहते हुए वह ‘मांँ’ को गले लगा लेता है और पिता दूर खड़े भावुक मन से दृश्य को देखकर मुस्कुरा उठते हैं।
सूरज अपनी लालिमा को छोड़कर किरणों संग मुस्कुरा उठता है।
तभी खुली खिड़की से पिता ने झाँका तो देखा।

बगीचे में खिला एक गुलाब मुस्करा रहा था।

मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’

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