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लघुकथा:- किस्मत का खेल लघुकथा- श्री पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’ (सुरेंद्रनगर-गुजरात)

 

किस्मत का खेल भी बड़े अजीब होते हैं।भाग्य और तकदीर की उतार चढ़ाव ही है किस्मत का खेल।जीवन कब क्या और कैसे बदल जाए कोई नहीं जानता।यह आपके कर्म,निरंतर मेहनत,सोच और सही फैसले से बनती है। जीवन में अच्छे अवसर पैदा होते हैं।लगन और मेहनत से किस्मत चमक सकती है।राकेश जब छोटा था उसके मधर फादर की एक अकस्मात में मृत्यु हो गई।राकेश अब बेसहारा बन गया था।उसके परिवार में चाचा चाची थे मगर नजदीकी रिश्तेदार कोई नहीं था। परिवार वालों ने भी राकेश की चिंता होने लगी थी।महेंद्रभाई उसके फूफा शहर में रहते थे।उसको विचार आया और उसकी पत्नी मीनाबेन को कहा;’मीना,भाई भाभी की मृत्यु के बाद गांव में राकेश अकेला हो गया है।मुझे राकेश की चिंता होने लगी है।गांव में रहेंगे तो उसकी पढ़ाई अच्छी तरह नहीं होगी।उसका भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। मैं चाहता हूं राकेश को यहां शहर में अपने पास रख ले।’
मीनाबेन ने कहा;’ हां, आपका विचार सही है।हम उसकी मदद नहीं करेंगे तो कौन करेगा अपने तो अपने होते हैं।’दूसरे दिन महेंद्रभाई राकेश को शहर में ले आया। राकेश को देखकर भावेश भी खुश हो गए। दोनों समवयस्क थे। एक ही स्कूल में एडमिशन करवाया। दोनों भाई साथ में स्कूल जाता,खेलता कुदता साथ में होमवर्क भी करता था। बाहरवीं कक्षा में सायंस में अच्छे परसेंटेज आया। दोनों को मेडिकल में एडमिशन भी मिल गया।भावेश और राकेश दोनों डॉक्टर भी बन गए। किस्मत का यही खेल है। राकेश की किस्मत में डॉक्टर बनना लिखा था। राकेश पढ़ने में होशियार था। कुदरत ने भी उसका साथ दिया। कुदरत जो करते हैं वह अच्छे के लिए करते हैं।
कुदरत का फैसला सही होता है। उनकी मेहनत रंग लाई। जीवन में सफल होने के लिए मेहनत और किस्मत दोनों की आवश्यकता है।

श्री पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’
(सुरेंद्रनगर-गुजरात)

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