निबंध संग्रह – मानवता बनाम सफलता की अंधी दौड – सुमन दुबे साऊखोर बड़हलगंज गोरखपुर

वर्तमान युग को यदि प्रतिस्पर्धा का युग कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। आज प्रत्येक व्यक्ति सफलता प्राप्त करने की होड़ में लगा हुआ है। कोई धन कमाने के लिए संघर्ष कर रहा है, कोई पद और प्रतिष्ठा के लिए, तो कोई प्रसिद्धि पाने के लिए। सफलता की इस अंधी दौड़ में मनुष्य निरंतर आगे बढ़ रहा है, किंतु दुर्भाग्यवश वह अपने साथ चलने वाली मानवता को पीछे छोड़ता जा रहा है। यही कारण है कि भौतिक रूप से समृद्ध होते हुए भी समाज भावनात्मक रूप से निर्धन होता जा रहा है।
मानवता मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण है। यह वह गुण है जो हमें केवल जीवित प्राणी नहीं, बल्कि सच्चा मनुष्य बनाता है। दूसरों के सुख-दुःख को समझना, पीड़ित की सहायता करना, असहाय का सहारा बनना और प्रेम व करुणा का व्यवहार करना ही मानवता का वास्तविक स्वरूप है। किंतु आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में लोगों के पास अपने लिए समय नहीं है, दूसरों की चिंता करना तो दूर की बात है। रिश्ते स्वार्थ के आधार पर बन रहे हैं और संवेदनाएँ सुविधाओं के नीचे दबती जा रही हैं।
आज हम देखते हैं कि लोग सफलता प्राप्त करने के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार हैं। कई बार वे नैतिक मूल्यों, ईमानदारी और मानवीय संवेदनाओं का भी त्याग कर देते हैं। उन्हें केवल लक्ष्य दिखाई देता है, मार्ग की पवित्रता नहीं। परिणामस्वरूप समाज में विश्वास, अपनापन और सहानुभूति जैसी भावनाएँ धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं। धन और पद प्राप्त करने के बाद भी व्यक्ति के जीवन में संतोष और शांति का अभाव बना रहता है, क्योंकि उसने सफलता तो पा ली, पर मानवता खो दी।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिन लोगों ने मानवता को सर्वोच्च स्थान दिया, उन्हें सदैव सम्मान और आदर मिला। ऐसे लोग भले ही अत्यधिक धनवान न रहे हों, परंतु उन्होंने अपने सद्गुणों से लोगों के हृदयों में अमिट स्थान बनाया। वास्तव में मनुष्य की महानता उसके पद या संपत्ति से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और चरित्र से आँकी जाती है।
हमें यह समझना होगा कि सफलता और मानवता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सच्ची सफलता वही है जो मानवता के साथ प्राप्त की जाए। यदि हमारी उपलब्धियाँ किसी के आँसू का कारण बनें, तो वे उपलब्धियाँ नहीं, केवल अहंकार हैं। वहीं यदि हमारी सफलता से किसी के जीवन में मुस्कान आए, किसी निराश व्यक्ति को आशा मिले, तो वही सफलता सार्थक कहलाती है।
अतः आवश्यकता इस बात की है कि हम सफलता की ओर बढ़ते हुए अपने मानवीय मूल्यों को न भूलें। पहले एक अच्छा और संवेदनशील मनुष्य बनें, उसके बाद सफल व्यक्ति। क्योंकि जीवन के अंतिम पड़ाव पर हमारे पद, पुरस्कार और संपत्ति नहीं, बल्कि हमारे द्वारा बाँटा गया प्रेम, करुणा और मानवता ही याद रखी जाती है। यही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि और सच्ची सफलता है।
सुमन दुबे साऊखोर
बड़हलगंज गोरखपुर
वर्तमान युग को यदि प्रतिस्पर्धा का युग कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। आज प्रत्येक व्यक्ति सफलता प्राप्त करने की होड़ में लगा हुआ है। कोई धन कमाने के लिए संघर्ष कर रहा है, कोई पद और प्रतिष्ठा के लिए, तो कोई प्रसिद्धि पाने के लिए। सफलता की इस अंधी दौड़ में मनुष्य निरंतर आगे बढ़ रहा है, किंतु दुर्भाग्यवश वह अपने साथ चलने वाली मानवता को पीछे छोड़ता जा रहा है। यही कारण है कि भौतिक रूप से समृद्ध होते हुए भी समाज भावनात्मक रूप से निर्धन होता जा रहा है।
मानवता मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण है। यह वह गुण है जो हमें केवल जीवित प्राणी नहीं, बल्कि सच्चा मनुष्य बनाता है। दूसरों के सुख-दुःख को समझना, पीड़ित की सहायता करना, असहाय का सहारा बनना और प्रेम व करुणा का व्यवहार करना ही मानवता का वास्तविक स्वरूप है। किंतु आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में लोगों के पास अपने लिए समय नहीं है, दूसरों की चिंता करना तो दूर की बात है। रिश्ते स्वार्थ के आधार पर बन रहे हैं और संवेदनाएँ सुविधाओं के नीचे दबती जा रही हैं।
आज हम देखते हैं कि लोग सफलता प्राप्त करने के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार हैं। कई बार वे नैतिक मूल्यों, ईमानदारी और मानवीय संवेदनाओं का भी त्याग कर देते हैं। उन्हें केवल लक्ष्य दिखाई देता है, मार्ग की पवित्रता नहीं। परिणामस्वरूप समाज में विश्वास, अपनापन और सहानुभूति जैसी भावनाएँ धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं। धन और पद प्राप्त करने के बाद भी व्यक्ति के जीवन में संतोष और शांति का अभाव बना रहता है, क्योंकि उसने सफलता तो पा ली, पर मानवता खो दी।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिन लोगों ने मानवता को सर्वोच्च स्थान दिया, उन्हें सदैव सम्मान और आदर मिला। ऐसे लोग भले ही अत्यधिक धनवान न रहे हों, परंतु उन्होंने अपने सद्गुणों से लोगों के हृदयों में अमिट स्थान बनाया। वास्तव में मनुष्य की महानता उसके पद या संपत्ति से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और चरित्र से आँकी जाती है।
हमें यह समझना होगा कि सफलता और मानवता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। सच्ची सफलता वही है जो मानवता के साथ प्राप्त की जाए। यदि हमारी उपलब्धियाँ किसी के आँसू का कारण बनें, तो वे उपलब्धियाँ नहीं, केवल अहंकार हैं। वहीं यदि हमारी सफलता से किसी के जीवन में मुस्कान आए, किसी निराश व्यक्ति को आशा मिले, तो वही सफलता सार्थक कहलाती है।
अतः आवश्यकता इस बात की है कि हम सफलता की ओर बढ़ते हुए अपने मानवीय मूल्यों को न भूलें। पहले एक अच्छा और संवेदनशील मनुष्य बनें, उसके बाद सफल व्यक्ति। क्योंकि जीवन के अंतिम पड़ाव पर हमारे पद, पुरस्कार और संपत्ति नहीं, बल्कि हमारे द्वारा बाँटा गया प्रेम, करुणा और मानवता ही याद रखी जाती है। यही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि और सच्ची सफलता है।
सुमन दुबे साऊखोर
बड़हलगंज गोरखपुर




