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अज्ञात प्रकाश – डॉ सरिता चौहान (प्रवक्ता हिंदी)

 

मन के अंधेरे में जब एक अज्ञात प्रकाश जगमगाता है,
वो तेरे आने का संकेत होता है।
तुझसे मिलने की आस और तुझे पाने का विश्वास,
मुझे निःसीमता की ओर खींच ले जाता है।
तू मेरा ईष्ट है या ईश्वर ,अनादि है या अनंत,
मुझे ज्ञात नहीं, पर तू अज्ञात तो नहीं।
तू विदित है, सर्व विदित है,
अविजित है अभिजीत है,
इसका मुझे ज्ञान तो नहीं
इसका मुझे भान तो नहीं
सिर्फ आभास होता है ।
एक आभासीय प्रकाश
जो मेरे अंतर्मन में जोत जलाए हुए है ,
तुझसे लगन लगाए हुए है।
एक असीम विश्वास
जो तुझसे मिलने के लिए मुझे व्याकुल किए हुए है,
पर इस सांसारिक दुनिया से भी मुझे व्यामोह है।
मैं इसे छोड़ना नहीं चाहती
और तुझे पाने की उम्मीद भी रखती हूँ।
कैसे संभव है यह दोनों।
तेरी बनाई हुई दुनिया कितनी रंगीन है
कितनी हसीन है ।
यह प्रकृति जो खूबसूरत है और खूबसूरत सा संदेश हमें देती रहती है
उसे मैं कैसे भूलूँ।
निमिया की छईयाँ, कदंब की डरिया
अमवा की डाली पर बोले कोईलारिया्
फूलों पर उड़ती तितलियां, कैसे दूर जाऊं इन सब से ।
उन सब में मुझे तुम नजर आने लगते हो
तेरी मधुर स्मृतियां मानो उसमें समायी हुई हों।
एक ऐसी आभासी प्रकाश
जो मुझे हमेशा उद्वेलित करती रहती है।

स्वरचित
डॉ सरिता चौहान (प्रवक्ता हिंदी)
पीएम श्री एडी राजकीय कन्या इंटर कॉलेज गोरखपुर उत्तर प्रदेश ।

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